कृषि मशीनीकरण को बढ़ावा: 140 किसानों को बैटरी स्प्रेयर और सोलर पैनल वितरित
रायपुर। किसानों को आधुनिक कृषि तकनीक से जोड़ने और खेती में श्रम एवं समय की बचत के उद्देश्य से भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद-राष्ट्रीय जैविक स्ट्रेस प्रबंधन संस्थान (आईसीएआर-निब्सम), रायपुर ने अनुसूचित जाति उप-योजना (एससीएसपी) के तहत कृषि उपकरणों का वितरण किया। संस्थान की ओर से किसानों एवं महिला किसानों को 140 बैटरी चालित पावर स्प्रेयर और सोलर पैनल के तीन सेट प्रदान किए गए।
इस कार्यक्रम में मुर्रा, बेठिया, देवगांव, अडसेना और बेलटुकरी गांवों से करीब 160 किसान एवं महिला किसान शामिल हुए। कृषि उपकरणों के वितरण का उद्देश्य खेती के कार्यों में आधुनिक तकनीक का उपयोग बढ़ाना, किसानों की शारीरिक मेहनत कम करना और पर्यावरण अनुकूल एवं टिकाऊ कृषि पद्धतियों को प्रोत्साहित करना है।
वर्षाजल को सहेजकर रबी फसल में करें उपयोग
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए संस्थान के निदेशक डॉ. पी.के. राय ने मानसून के दौरान वर्षाजल के संरक्षण पर जोर दिया। उन्होंने किसानों से अपील की कि गांवों में उपलब्ध जल-संचयन एवं जल-संरक्षण संरचनाओं का उपयोग करते हुए बारिश के पानी को अधिक से अधिक संग्रहित किया जाए।
उन्होंने कहा कि मानसून के दौरान संचित पानी का उपयोग रबी मौसम की फसलों के लिए किया जा सकता है। इससे सिंचाई की उपलब्धता बढ़ेगी और जल संसाधनों का बेहतर प्रबंधन संभव होगा। उन्होंने किसानों को फसल विविधीकरण अपनाने की सलाह देते हुए कहा कि अलग-अलग फसलों का उत्पादन किसानों की आय बढ़ाने के साथ कृषि जोखिम को कम करने में भी सहायक है।
तकनीक और प्रशिक्षण से मजबूत होगी किसानों की क्षमता
डॉ. राय ने बताया कि एससीएसपी के माध्यम से संस्थान ग्रामीण क्षेत्रों के किसानों और महिला किसानों को उनकी जरूरत के अनुसार तकनीकी जानकारी, प्रशिक्षण, कृषि सामग्री और आधुनिक उपकरण उपलब्ध करा रहा है। उन्होंने कहा कि इस तरह की पहल किसानों को नई तकनीकों से परिचित कराने के साथ उनकी उत्पादन क्षमता और कृषि आय बढ़ाने में मदद करती है।
धान की फसल में कीट-रोगों की नियमित निगरानी जरूरी
संयुक्त निदेशक एवं कार्यक्रम समन्वयक डॉ. पंकज शर्मा ने किसानों को वर्तमान मौसम में धान की फसल पर विशेष निगरानी रखने की सलाह दी। उन्होंने बताया कि इस समय धान की फसल रोपाई के लगभग 40 से 50 दिन की अवस्था में है। इस दौरान कई क्षेत्रों में तना छेदक और पत्ती लपेटक जैसे कीटों का प्रकोप देखा जा रहा है। कुछ स्थानों पर जीवाणु झुलसा रोग के लक्षण भी सामने आए हैं।
उन्होंने किसानों से कहा कि फसल में किसी भी कीट या रोग के लक्षण दिखाई देने पर शुरुआती स्तर पर ही उसकी पहचान कर उचित प्रबंधन उपाय अपनाएं। बिना आवश्यकता कीटनाशकों का प्रयोग करने से बचने की सलाह देते हुए उन्होंने फेरोमोन ट्रैप और ट्राइकोकार्ड को एकीकृत कीट प्रबंधन (IPM) का हिस्सा बनाने पर जोर दिया।
डॉ. शर्मा ने कहा कि रासायनिक कीटनाशकों का इस्तेमाल केवल कीट प्रकोप की वास्तविक स्थिति और आवश्यकतानुसार ही किया जाना चाहिए। इससे उत्पादन लागत कम करने के साथ पर्यावरण और फसल स्वास्थ्य पर पड़ने वाले अनावश्यक प्रभाव को भी कम किया जा सकता है।
किसानों ने जताया संस्थान का आभार
कार्यक्रम में शामिल किसानों और ग्राम प्रतिनिधियों ने कृषि उपकरण, तकनीकी जानकारी और आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराने के लिए संस्थान के प्रति आभार व्यक्त किया। किसानों ने कहा कि बैटरी चालित पावर स्प्रेयर से छिड़काव का काम आसान होने के साथ श्रम और समय दोनों की बचत होगी। वहीं सोलर पैनल जैसी पहल टिकाऊ कृषि एवं ऊर्जा के वैकल्पिक उपयोग को बढ़ावा देने में उपयोगी साबित होगी।
कार्यक्रम में सरपंच कंचन गायकवाड़, प्रदीप मडरिया सहित संस्थान के वैज्ञानिक एवं अधिकारी मौजूद रहे। कार्यक्रम का समन्वय प्रधान वैज्ञानिक एवं नोडल अधिकारी डॉ. के.सी. शर्मा ने किया।
