मुख्यमंत्री विष्णु देव साय को बस्तर दशहरा 2026 में शामिल होने का आमंत्रण

रायपुर। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय से आज शाम राजधानी रायपुर स्थित मुख्यमंत्री निवास कार्यालय में बस्तर सांसद महेश कश्यप के नेतृत्व में बस्तर दशहरा समिति, जगदलपुर के प्रतिनिधिमंडल ने मुलाकात की। प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री को विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा पर्व 2026 में शामिल होने का आमंत्रण दिया। इस दौरान बस्तर की पारंपरिक जनजातीय संस्कृति के अनुरूप मुख्यमंत्री को पागा पहनाकर सम्मानित किया गया।
मुख्यमंत्री साय ने आमंत्रण के लिए प्रतिनिधिमंडल का आभार जताते हुए बस्तर दशहरा के सफल आयोजन की शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कहा कि बस्तर दशहरा प्रदेश की ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण प्रतीक है। यह पर्व सदियों से चली आ रही आस्था, जनजातीय परंपराओं और सामुदायिक सहभागिता को जीवंत बनाए हुए है। इसके माध्यम से बस्तर की सांस्कृतिक विशिष्टता और सामाजिक एकजुटता की झलक मिलती है। राज्य सरकार बस्तर की समृद्ध विरासत के संरक्षण और जनजातीय परंपराओं को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है।
प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री को बस्तर दशहरा के इतिहास, इससे जुड़े धार्मिक अनुष्ठानों, पारंपरिक व्यवस्थाओं और वर्ष 2026 में आयोजित होने वाले विभिन्न कार्यक्रमों की जानकारी भी दी।
75 दिनों तक चलने वाला अनूठा सांस्कृतिक महापर्व
बस्तर दशहरा देश के सबसे विशिष्ट सांस्कृतिक आयोजनों में शामिल है। इसकी परंपरा लगभग 75 दिनों तक चलती है। हरेली अमावस्या से शुरू होने वाले इस पर्व में विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं, जिनका समापन आश्विन शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तक होता है।
इस वर्ष 12 अगस्त को पाटजात्रा पूजा विधान के साथ पर्व की शुरुआत हुई। आयोजन की निर्धारित रूपरेखा के अनुसार 10 अक्टूबर को काछनगादी पूजा, 18 अक्टूबर को बेल पूजा और 23 अक्टूबर को मुरिया दरबार आयोजित किया जाएगा। पर्व के प्रत्येक चरण में बस्तर के विभिन्न समुदायों की परंपरागत भूमिका रहती है, जो इस आयोजन को विशिष्ट स्वरूप प्रदान करती है।
मां दंतेश्वरी की आराधना है पर्व का प्रमुख आधार
बस्तर दशहरा की सबसे खास पहचान इसकी अनूठी धार्मिक परंपरा है। देश के अन्य हिस्सों में दशहरा भगवान श्रीराम की रावण पर विजय के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है, जबकि बस्तर में यह पर्व आराध्य देवी मां दंतेश्वरी की पूजा-अर्चना और उनके प्रति अटूट श्रद्धा को समर्पित है।
इस पर्व का ऐतिहासिक संबंध चालुक्य शासक पुरुषोत्तम देव से भी जोड़ा जाता है। प्रचलित मान्यता के अनुसार, पुरुषोत्तम देव पुरी स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर की यात्रा पर गए थे, जहां उन्हें ‘रथपति’ की उपाधि प्राप्त हुई। इसी ऐतिहासिक परंपरा के चलते बस्तर दशहरा में रथ और रथयात्रा का विशेष महत्व है।
बस्तर दशहरा का आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें स्थानीय समाज की सामूहिक भागीदारी भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। मांझी, चालकी, मेम्बर-मेम्बरीन और विभिन्न समुदायों के प्रतिनिधि अपनी पारंपरिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हैं। पूजा-विधानों से लेकर रथ निर्माण और आयोजन की व्यवस्थाओं तक स्थानीय समुदायों का योगदान इस पर्व की मूल विशेषता है।
पीढ़ियों से चली आ रही यह व्यवस्था बस्तर दशहरा को सामाजिक एकता, सामूहिक जिम्मेदारी और सांस्कृतिक समन्वय का उदाहरण बनाती है।
बस्तर की लोक संस्कृति और पर्यटन को मिलती है वैश्विक पहचान
भव्य रथयात्रा, पारंपरिक पूजा-विधान, जनजातीय रीति-रिवाज और लोक संस्कृति बस्तर दशहरा को विशिष्ट पहचान देते हैं। इस ऐतिहासिक आयोजन को देखने के लिए हर वर्ष देश के विभिन्न हिस्सों और विदेशों से भी श्रद्धालु तथा पर्यटक बस्तर पहुंचते हैं।
यह पर्व बस्तर की सदियों पुरानी सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित रखने के साथ नई पीढ़ी को अपनी परंपराओं से जोड़ने का माध्यम भी है। इसके आयोजन से क्षेत्र की लोक कलाओं, पारंपरिक रीति-रिवाजों और पर्यटन को व्यापक पहचान मिलती है। विभिन्न समुदायों की सहभागिता और मां दंतेश्वरी के प्रति अटूट आस्था इस उत्सव की विशिष्टता को और बढ़ाती है।
मुख्यमंत्री साय ने कहा कि बस्तर की संस्कृति छत्तीसगढ़ की अमूल्य धरोहर है। बस्तर दशहरा जैसी परंपराएं हमारी सांस्कृतिक जड़ों को मजबूत करती हैं और आने वाली पीढ़ियों को अपनी विरासत से परिचित कराती हैं। इन परंपराओं को सहेजना, उनका संवर्धन करना और देश-दुनिया तक उनकी पहचान पहुंचाना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।
प्रतिनिधिमंडल में ये रहे शामिल
मुख्यमंत्री को आमंत्रित करने पहुंचे प्रतिनिधिमंडल में बस्तर सांसद महेश कश्यप के साथ परगनाकरेकोट के मंगलु मांझी, बलराम मांझी, पदम् चालकी, समारू चालकी, डमरू चालकी, लक्ष्मण मांझी सहित मांझी, चालकी, मेम्बर-मेम्बरीन और बस्तर दशहरा समिति के अन्य प्रतिनिधि मौजूद रहे।

