अदाणी की करतूत से बिफरा छत्तीसगढ़! ‘यहां बच्चे ABCD नहीं जानते थे’ वाले विज्ञापन पर उठे सवाल, आखिर ये शिल्पी सिंह हैं कौन?

रायपुर। छत्तीसगढ़ की शिक्षा, संस्कृति और सामाजिक अस्मिता को लेकर एक विज्ञापन ने नई बहस छेड़ दी है। अदाणी फाउंडेशन की ओर से प्रकाशित इस विज्ञापन में एक महिला की तस्वीर के साथ शिल्पी सिंह का नाम दिया गया है और दावा किया गया है—“यहाँ बच्चे ABCD नहीं जानते थे, आज IIT कोचिंग ले रहे हैं।”

विज्ञापन में आगे शिक्षा, महिलाओं के प्रशिक्षण और स्वास्थ्य सुविधाओं से जुड़े कार्यों का उल्लेख किया गया है।

विज्ञापन सामने आने के बाद सोशल मीडिया और छत्तीसगढ़ के लोगों के बीच यह सवाल उठने लगा है कि क्या प्रदेश के ग्रामीण और आदिवासी इलाकों की शिक्षा व्यवस्था को इस तरह प्रस्तुत करना उचित है? क्या किसी कॉरपोरेट संस्था की सामाजिक पहल को प्रचारित करने के लिए छत्तीसगढ़ के बच्चों की पूर्व स्थिति को इस अंदाज में दिखाना प्रदेश की प्रतिभा और उसकी शैक्षणिक विरासत को कमतर आंकने जैसा नहीं है?

‘ABCD नहीं जानते थे’ पर सबसे बड़ा सवाल

विज्ञापन की सबसे विवादित पंक्ति यही है—“यहाँ बच्चे ABCD नहीं जानते थे…”

छत्तीसगढ़ में सरकारी और निजी स्कूलों, शिक्षकों, सामाजिक संस्थाओं तथा स्थानीय समुदायों के लंबे प्रयासों से शिक्षा का विस्तार हुआ है। प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों से डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक, वैज्ञानिक, प्रशासनिक अधिकारी, न्यायिक अधिकारी, खिलाड़ी, कलाकार और अनेक क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाने वाली प्रतिभाएं निकलती रही हैं।

ऐसे में सवाल यह है कि किसी क्षेत्र की मौजूदा शिक्षा संबंधी चुनौतियों को दिखाने और उस क्षेत्र को इस तरह पेश करने में अंतर क्यों नहीं रखा गया?

विकास का श्रेय लें, लेकिन प्रदेश की क्षमता पर सवाल क्यों?

CSR और सामाजिक दायित्व के तहत शिक्षा, स्वास्थ्य और कौशल विकास के क्षेत्र में किसी संस्था द्वारा किया गया काम निश्चित रूप से चर्चा और मूल्यांकन का विषय हो सकता है। लेकिन सवाल उस प्रस्तुति का है जिसमें ऐसा संदेश जाता है कि मानो किसी बाहरी संस्था के आने से पहले यहां के बच्चों को बुनियादी अंग्रेजी अक्षर तक का ज्ञान नहीं था।

छत्तीसगढ़ के लोगों की नाराजगी इसी बिंदु पर दिखाई दे रही है। प्रदेश की अपनी शिक्षा व्यवस्था, स्थानीय शिक्षकों और दशकों से काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ताओं के योगदान को नजरअंदाज कर किसी कॉरपोरेट पहल को ‘पहले और बाद’ की कहानी के रूप में पेश करना कितना उचित है, यह बहस का विषय है।

आखिर ये शिल्पी सिंह हैं कौन?

विज्ञापन में “शिल्पी सिंह” नाम के साथ “हसदेव निवासी” लिखा दिखाई देता है। हालांकि, उपलब्ध सार्वजनिक स्रोतों की पड़ताल में इस विज्ञापन वाली शिल्पी सिंह की विश्वसनीय प्रोफाइल, पद, संस्था में भूमिका या शैक्षणिक पृष्ठभूमि की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।

इसलिए फिलहाल यह कहना भी उचित नहीं होगा कि वे अदाणी फाउंडेशन की कर्मचारी हैं या किसी विशेष पद पर कार्यरत हैं। विज्ञापन में उनका नाम और तस्वीर किस भूमिका में इस्तेमाल की गई है, यह स्पष्ट करने की जिम्मेदारी विज्ञापन जारी करने वाली संस्था की है।

छत्तीसगढ़ पूछ रहा है—कहानी किसकी, नजरिया किसका?

छत्तीसगढ़ को विकास चाहिए, शिक्षा चाहिए, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं चाहिए और युवाओं के लिए रोजगार व अवसर चाहिए। कॉरपोरेट संस्थाओं की CSR पहलें भी इसमें योगदान दे सकती हैं। लेकिन विकास की कहानी लिखते समय स्थानीय समाज को पिछड़ा, अक्षम या ज्ञान से वंचित दिखाना जरूरी नहीं है।

जरूरत इस बात की है कि उपलब्धियों का प्रचार हो, लेकिन उसमें उस मिट्टी के शिक्षक, अभिभावक, विद्यार्थी और समुदाय भी दिखाई दें, जिन्होंने वर्षों तक सीमित संसाधनों में शिक्षा की मशाल जलाए रखी।

शिल्पी सिंह और विज्ञापन के दावों को लेकर अनुत्तरित सवाल

  • विज्ञापन में शिल्पी सिंह की वास्तविक भूमिका क्या है?

  • क्या वे अदाणी फाउंडेशन से जुड़ी हैं या केवल लाभार्थी/स्थानीय निवासी हैं?

  • विज्ञापन में इस्तेमाल किया गया “ABCD नहीं जानते थे” दावा किस सर्वे, अध्ययन या आंकड़े पर आधारित है?

  • IIT कोचिंग लेने वाले बच्चों की कुल संख्या कितनी है?

  • विज्ञापन में जिन शिक्षा, प्रशिक्षण और स्वास्थ्य सुविधाओं का उल्लेख है, उनका वास्तविक कवरेज कितना है?

  • क्या अदाणी फाउंडेशन इस विज्ञापन के दावों का विस्तृत तथ्यात्मक आधार सार्वजनिक करेगा?