अमेरिका का भारत समेत 5 देशों पर 100% टैरिफ का प्रस्ताव: रूस से तेल खरीदने पर कसा शिकंजा, अमेरिकी संसद में नया बिल पेश

वाशिंगटन/नई दिल्ली, 16 जुलाई 2026:

रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच रूस की आर्थिक कमर तोड़ने के लिए अमेरिका ने एक और बड़ा कदम उठाया है। अमेरिकी संसद (सीनेट) में एक नया संशोधित द्विदलीय (Bipartisan) विधेयक पेश किया गया है, जिसके तहत रूस से तेल और प्राकृतिक गैस खरीदने वाले दुनिया के शीर्ष 5 देशों पर 100% तक सीमा शुल्क (टैरिफ) लगाया जा सकता है। इन पांच देशों में भारत भी शामिल है।

इस अमेरिकी कदम का मुख्य उद्देश्य रूस के ऊर्जा निर्यात से होने वाली मोटी कमाई को पूरी तरह से रोकना है, जिससे वह अपने युद्ध खर्चों को नियंत्रित न कर सके।

इन 5 देशों पर गिरेगी गाज

अमेरिकी सीनेटरों द्वारा पेश किए गए इस संशोधित बिल में रूस से कच्चे तेल के शीर्ष पांच खरीदारों को विशेष रूप से लक्षित किया गया है। सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंटथल के अनुसार, इन देशों में शामिल हैं:

  1. भारत

  2. चीन

  3. स्लोवाकिया

  4. हंगरी

  5. अज़रबैजान

प्रस्तावित कानून के तहत, इन पांच देशों से अमेरिका आने वाले सामानों पर 100% तक का भारी-भरकम सीमा शुल्क लगाया जा सकता है।

पुराने प्रस्ताव में दी गई है बड़ी ढील

आपको बता दें कि यह बिल पहले के मुकाबले थोड़ा उदार है। इससे पहले अमेरिकी सीनेट में पेश किए गए प्रस्ताव में रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर 500% तक टैरिफ लगाने की सख्त बात कही गई थी। महीनों की चर्चा और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सहमति के बाद इस दर को घटाकर अधिकतम 100% तक सीमित किया गया है।

साथ ही, इस विधेयक में उन 15 यूरोपीय देशों को छूट दी गई है जो रूस से अपनी जरूरत का 15% से कम प्राकृतिक गैस आयात करते हैं और अपनी इस निर्भरता को लगातार कम करने में जुटे हैं।

भारत में राजनीतिक हलचल तेज

अमेरिका के इस कदम के बाद भारत में भी राजनीतिक सरगर्मियां बढ़ गई हैं। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार को घेरते हुए केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल से स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है।

वैश्विक दबाव के बावजूद भारत ने अब तक रूस से रियायती दरों पर कच्चे तेल का आयात जारी रखा है, जो भारत की घरेलू तेल जरूरतों को पूरा करने में बेहद मददगार साबित हुआ है। ऐसे में यदि यह अमेरिकी बिल कानून का रूप लेता है, तो भारत-अमेरिका व्यापारिक रिश्तों और भारत की विदेश नीति के लिए यह एक बड़ी परीक्षा साबित होगी।