Sawan Somwar 2026: उज्जैन के महाकाल की तर्ज पर रायपुर का अमलेश्वर धाम, खारून तट पर विराजे स्वयंभू महाकाल

पौराणिक मान्यताओं से जुड़ा है श्री महाकाल धाम का इतिहास, सावन में उमड़ते हैं शिवभक्त; रुद्राभिषेक से लेकर विशेष अनुष्ठानों तक की है परंपरा

रायपुर। सावन के सोमवार को भगवान शिव की आराधना के लिए जहां उज्जैन का महाकालेश्वर देशभर में प्रसिद्ध है, वहीं छत्तीसगढ़ में भी एक ऐसा शिवधाम है, जिसे श्रद्धालु श्री महाकाल धाम अमलेश्वर के नाम से जानते हैं। रायपुर से सटे अमलेश्वर में खारून नदी के तट पर स्थित यह धाम अपनी धार्मिक मान्यताओं, स्वयंभू शिवलिंग और वर्षों से चली आ रही पूजा परंपरा के कारण सावन में विशेष आकर्षण का केंद्र बन जाता है।

खारून नदी यहां दक्षिण से उत्तर दिशा की ओर मुड़ती हुई बहती है। नदी का यह प्राकृतिक स्वरूप और उसके तट पर स्थित शिवधाम पूरे क्षेत्र को विशिष्ट धार्मिक वातावरण प्रदान करता है। सावन में बड़ी संख्या में कांवड़िए और श्रद्धालु खारून में स्नान करने के बाद महाकाल के दर्शन और जलाभिषेक के लिए पहुंचते हैं।

सावन में गूंजता है हर-हर महादेव का जयघोष

श्री महाकाल धाम में सावन के दौरान सुबह से ही श्रद्धालुओं की आवाजाही शुरू हो जाती है। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच भगवान शिव की पूजा-अर्चना, जलाभिषेक और रुद्राभिषेक किया जाता है।

मंदिर में भगवान महाकाल का अलग-अलग स्वरूपों में श्रृंगार भी किया जाता है। बाल स्वरूप से लेकर अर्धनारीश्वर रूप तक विशेष श्रृंगार श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र रहता है। दिनभर की धार्मिक गतिविधियों के बाद शाम की आरती और फिर शयन आरती के साथ पूजा की परंपरा आगे बढ़ती है।

खारून किनारे प्रकट हुआ स्वयंभू शिवलिंग

अमलेश्वर धाम से जुड़ी स्थानीय मान्यता के अनुसार करीब एक सदी पहले यह इलाका घने जंगलों से घिरा हुआ था। क्षेत्र में चूने की भट्टियों पर काम करने वाले मजदूर जंगल के आसपास रहते थे और उन्होंने यहां स्थित शिवलिंग की पूजा-अर्चना शुरू की।

समय के साथ भट्टियां बंद हो गईं और वहां रहने वाले लोग भी दूसरी जगह चले गए। इसके बाद शिवलिंग मिट्टी में दब गया और यह स्थान लंबे समय तक उपेक्षित रहा।

स्थानीय धार्मिक परंपरा के अनुसार वर्ष 2004 में अशोक अग्रवाल को स्वप्न में शिवलिंग के मिट्टी में दबे होने की जानकारी मिली। इसके बाद खारून नदी के किनारे खेत में खोज की गई। नीम के पेड़ के पास मिट्टी के भीतर शिवलिंग मिलने की बात सामने आई। इसके बाद यहां विधिवत पूजा-अर्चना शुरू हुई।

टेंट से भव्य धाम तक पहुंची पूजा की परंपरा

शिवलिंग के प्रकट होने के बाद शुरुआत में एक अस्थायी टेंट में पूजा की जाती थी। धीरे-धीरे श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ती गई और यह स्थान धार्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र बनता गया।

धाम के सर्वराकार पंडित प्रियाशरण त्रिपाठी के अनुसार, वर्ष 2004 से यहां पूजा-अर्चना की परंपरा निरंतर चल रही है। जनवरी 2024 में इस धार्मिक स्थल को औपचारिक रूप से ‘श्री महाकाल धाम अमलेश्वर’ नाम दिया गया। इसके बाद धाम के जीर्णोद्धार का कार्य भी प्रारंभ किया गया।

आज यहां श्रद्धालु दर्शन के साथ रुद्राभिषेक, पूजन और महाप्रसादी में भी शामिल होते हैं।

क्यों पड़ा नाम ‘अमलेश्वर’?

अमलेश्वर नाम को लेकर धार्मिक ग्रंथों और स्थानीय परंपराओं में अलग-अलग मान्यताएं मिलती हैं। एक धार्मिक व्याख्या में ‘अमल’ का अर्थ पापरहित या निर्मल बताया गया है। इसी आधार पर अमलेश्वर को पापों से मुक्त करने वाले परमात्मा के स्वरूप से जोड़ा जाता है।

एक अन्य पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान शिव की आराधना और ओंकारेश्वर से जुड़ी कथा में शिवलिंग के दो स्वरूपों का उल्लेख मिलता है, जिनमें एक ओंकारेश्वर और दूसरा अमलेश्वर कहलाया।

इन्हीं धार्मिक मान्यताओं के कारण इस स्थान को अमलेश्वर के नाम से विशेष पहचान मिली।

यहां होते हैं कई विशेष धार्मिक अनुष्ठान

महाकाल धाम में केवल सामान्य पूजा ही नहीं, बल्कि विद्वान आचार्यों के मार्गदर्शन में विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान भी कराए जाते हैं। श्रद्धालु अपनी धार्मिक आवश्यकताओं के अनुसार नारायण नागबली, कालसर्प सहित विभिन्न कर्मकांड और विशेष पूजन कराते हैं।

विवाह संबंधी बाधाओं के निवारण के लिए भी यहां विशेष धार्मिक परंपराओं के तहत अर्क विवाह और कुंभ विवाह जैसे अनुष्ठान कराए जाने की जानकारी दी जाती है।

करीब दो दशक से इन धार्मिक गतिविधियों के चलते अमलेश्वर धाम आसपास के क्षेत्रों के श्रद्धालुओं के लिए महत्वपूर्ण पूजा स्थल बन चुका है।

गर्भगृह में शिव के साथ विराजमान हैं अन्य देवी-देवता

धाम के गर्भगृह में भगवान गणेश, कैलाशपति भगवान शंकर और चतुर्भुजी महामाया दुर्गा की प्रतिमाएं विराजित हैं। मंदिर के मुख्य द्वार पर नंदी महाराज विराजमान हैं।

धाम परिसर में क्षेत्राधिपति भगवान शनि की प्रतिमा भी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र है। धार्मिक वातावरण, खारून नदी का तट और परिसर में मौजूद वृक्षों की हरियाली इस स्थान को आध्यात्मिक शांति का अनुभव कराती है।

सावन में बढ़ जाती है श्रद्धालुओं की भीड़

सावन के सोमवार और विशेष धार्मिक अवसरों पर अमलेश्वर महाकाल धाम में श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ जाती है। कांवड़िए खारून नदी से जल लेकर भगवान महाकाल का अभिषेक करते हैं। स्थानीय लोगों के साथ रायपुर और आसपास के क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।

रायपुर के करीब स्थित यह धाम अब केवल एक स्थानीय शिव मंदिर नहीं, बल्कि अपनी पौराणिक मान्यताओं, स्वयंभू शिवलिंग और दो दशक से जारी धार्मिक परंपरा के कारण छत्तीसगढ़ के प्रमुख शिव आस्था केंद्रों में अपनी पहचान बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।