Nava Raipur Sevagram: 109 करोड़ खर्च के बाद भी खाली पड़ा नवा रायपुर का ‘सेवाग्राम’, निर्माण पूरा पर संचालन गायब

रायपुर / नवा रायपुर: गांधी जयंती के अवसर पर नवा रायपुर स्थित ड्रीम प्रोजेक्ट ‘सेवाग्राम’ पर सवाल उठ रहे हैं। महात्मा गांधी के ग्राम-स्वराज और आत्मनिर्भर भारत के सपने को साकार करने के उद्देश्य से लगभग 109 करोड़ रुपये की लागत से बना यह परिसर आज सन्नाटे में डूबा हुआ है। भव्य इमारतें बनकर तैयार हैं, लेकिन न तो यहाँ कोई गांधीवादी प्रशिक्षण चल रहा है और न ही हस्तशिल्प से जुड़ी गतिविधियाँ शुरू हो पाई हैं।

1. 109 करोड़ रुपये खर्च, फिर भी परिसर वीरान

  • गांधी जयंती पर सन्नाटा: राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती के दिन भी नवा रायपुर का सेवाग्राम परिसर खाली पड़ा है।

  • 107.77 करोड़ रुपये से अधिक खर्च: विधानसभा में दी गई आधिकारिक जानकारी के अनुसार, इस प्रोजेक्ट के निर्माण पर अब तक 107.77 करोड़ रुपये से अधिक (लगभग 109 करोड़) की राशि खर्च की जा चुकी है।

  • मौजूदा स्थिति: परिसर में इमारतें, सड़कें और आधारभूत ढांचा पूरी तरह तैयार है, लेकिन कारीगरों, कलाकारों और आगंतुकों की मौजूदगी शून्य है।

2. वर्धा के ‘सेवाग्राम’ की तर्ज पर बनी थी योजना

  • प्रोजेक्ट की शुरुआत: तत्कालीन भूपेश बघेल (कांग्रेस) सरकार ने 10 मार्च 2022 को महाराष्ट्र के वर्धा स्थित गांधी आश्रम की तर्ज पर इस प्रोजेक्ट को मंजूरी दी थी।

  • प्रस्तावित भव्य सुविधाएं:

    • बायोडायवर्सिटी पार्क और इकोलॉजिकल पॉन्ड

    • म्यूजियम, लाइब्रेरी, प्रेयर हॉल और विजिटर सेंटर

    • एग्जिबिशन हॉल, एम्फीथिएटर और फ्रीडम वॉक

    • स्थानीय हस्तशिल्प की दुकानें, कारीगरों के लिए आवास, वर्कशॉप, क्लासरूम और कॉमन किचन

3. विधानसभा में गूंजा मुद्दा: बिना प्रशासनिक सेटअप के बना प्रोजेक्ट?

जुलाई 2026 के विधानसभा सत्र के दौरान इस महत्वाकांक्षी परियोजना को लेकर तीखी बहस हुई थी:

  • भाजपा विधायक अजय चंद्राकर का सवाल: उन्होंने बिना ठोस प्लानिंग के इतनी बड़ी राशि खर्च करने पर सवाल उठाए थे और पूछा था कि इसका संचालन कब शुरू होगा।

  • वित्त मंत्री ओपी चौधरी का जवाब: मंत्री ओपी चौधरी ने कहा कि पिछली सरकार में निर्माण तो करा दिया गया, लेकिन इसके संचालन के लिए कोई प्रशासनिक सेटअप (Administrative Setup) स्वीकृत नहीं किया गया था। उन्होंने इसे जनधन का अनुचित प्रबंधन करार दिया।

  • पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का पक्ष: भूपेश बघेल ने योजना का बचाव करते हुए कहा कि इसका मुख्य ध्येय गांधीवादी मूल्यों को सहेजना और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना है।

4. मुख्य चुनौती: संचालन और स्टाफ का अभाव

  • खाली ढांचा बनी इमारतें: सत्ता परिवर्तन के बाद भी मुख्य समस्या जस की तस बनी हुई है। भवन और ढांचा तैयार होने के बावजूद संचालन की कोई ठोस रूपरेखा तय नहीं है।

  • आगे की राह: जब तक परिसर में नियमित प्रशासनिक अमला, ट्रेनर्स, कारीगर और प्रबंधन की व्यवस्था नहीं होगी, तब तक यह 109 करोड़ का प्रोजेक्ट महज़ एक इमारती ढांचा ही बना रहेगा। हालांकि, वर्तमान सरकार ने इसके संचालन के लिए जल्द तंत्र विकसित करने का आश्वासन दिया है।