CEC ज्ञानेश कुमार विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया नोटिस, तुरंत सस्पेंड करने से इनकार; जानें पूरा मामला

नई दिल्ली / लीगल न्यूज

सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार से जुड़े विवाद पर सुनवाई करते हुए उन्हें नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। हालाँकि, शीर्ष अदालत ने ज्ञानेश कुमार को तुरंत निलंबित (Suspend) करने या उनके काम-काज पर रोक लगाने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया है।

1. सुप्रीम कोर्ट का फैसला और रुख

  • नोटिस जारी: CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ (Bench) ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को नोटिस जारी कर उनका रुख पूछा है।

  • सस्पेंशन की मांग खारिज: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक ठोस तथ्य और सबूत सामने नहीं आ जाते, केवल मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ तुरंत कार्रवाई नहीं की जा सकती।

2. क्या हैं मुख्य आरोप?

  • स्पेशल इंटेन्सिव रिवीजन (SIR) विवाद: याचिका में आरोप लगाया गया है कि SIR से जुड़े करीब 14 महत्वपूर्ण फैसले दो अन्य चुनाव आयुक्तों (सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी) की सहमति के बिना एकतरफा तरीके से लिए गए।

  • वोटर लिस्ट और डेटाबेस में बदलाव: फॉर्म-6 (Form 6) में बिना अनुमति बदलाव करने, वोटर लिस्ट डेटाबेस को सेंट्रलाइज्ड करने और ECINet सिस्टम के जरिए पात्र मतदाताओं के नाम दोबारा बहाल न करने जैसे गंभीर आरोप शामिल हैं।

  • SIT जांच और आपराधिक कार्रवाई की मांग: याचिकाकर्ताओं और विपक्ष ने इन विवादित फैसलों को निरस्त करने, SIR प्रक्रिया के तहत हटाए गए नामों की SIT जांच कराने तथा जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 की धारा 32 के तहत आपराधिक मुकदमा चलाने की मांग की है।

3. कहाँ से शुरू हुआ विवाद?

इस पूरे विवाद की शुरुआत एक मीडिया रिपोर्ट के बाद हुई। रिपोर्ट में दावा किया गया था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में SIR प्रक्रिया से जुड़े फैसलों को लेकर लगभग 14 बार अपनी औपचारिक आपत्तियां दर्ज कराई थीं, लेकिन उन्हें दरकिनार कर फैसले लागू कर दिए गए।

4. आगे क्या हो सकता है? (3 मुख्य पहलू)

  1. धारा 16 के तहत कानूनी सुरक्षा: ‘मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023’ की धारा 16 चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक काम के सिलसिले में किसी भी दीवानी या आपराधिक कार्रवाई से कानूनी सुरक्षा प्रदान करती है।

  2. भाजपा (सत्तारूढ़ पक्ष) का रुख: सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने इन आरोपों को आधारहीन करार दिया है। पार्टी का कहना है कि चुनाव आयोग के भीतर आपत्तियां दर्ज होना एक स्वस्थ लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है, न कि किसी गड़बड़ी का सबूत।

  3. महाभियोग की संवैधानिक प्रक्रिया: मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने के लिए संसद में महाभियोग (Impeachment) प्रस्ताव पारित करना अनिवार्य होता है। इसके लिए संसद के दोनों सदनों में 2/3 बहुमत की आवश्यकता होती है, जो फिलहाल विपक्ष के पास उपलब्ध नहीं है।