कांग्रेस का स्पष्ट स्टैंड: 1937 के फैसले का पालन करते हुए ‘वंदे मातरम’ के केवल पहले दो पैरा ही गाएगी पार्टी

नई दिल्ली: राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ के गायन को लेकर एक बार फिर राजनीतिक चर्चा तेज हो गई है। कांग्रेस पार्टी ने अपने ऐतिहासिक रुख को दोहराते हुए स्पष्ट किया है कि वह वर्ष 1937 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) द्वारा लिए गए फैसले का सम्मान और पालन करते हुए कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम’ के केवल पहले दो पद (छंद) ही गाएगी।

1937 का कोलकाता अधिवेशन और रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह

यह फैसला नया नहीं है, बल्कि इसका इतिहास 1937 के कोलकाता (तत्कालीन कलकत्ता) कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) के प्रस्ताव से जुड़ा है। उस समय राष्ट्रगीत के विभिन्न अंशों को लेकर उठे विवाद के समाधान के लिए रवींद्रनाथ टैगोर, पंडित जवाहरलाल नेहरू और अन्य शीर्ष नेताओं की एक समिति बनाई गई थी।

रवींद्रनाथ टैगोर के सुझाव पर कांग्रेस ने स्वीकार किया था कि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा लिखित ‘वंदे मातरम’ के शुरुआती दो छंद पूरी तरह से भारत भूमि की सुंदरता, उर्वरता और मातृभूमि के प्रति वंदना को समर्पित हैं, जिनमें किसी भी धार्मिक प्रतीक का समावेश नहीं है।

पहले दो पैरा ही क्यों?

  • सद्भाव और धर्मनिरपेक्षता: 1937 के प्रस्ताव का मुख्य उद्देश्य देश के सभी समुदायों और धर्मों को एकजुट रखना था।

  • मातृभूमि का प्राकृतिक वर्णन: शुरुआती दो पदों में केवल नदियों, फलों, हवाओं और हरे-भरे खेतों से समृद्ध भारत माता का गुणगान किया गया है, जिस पर किसी को आपत्ति नहीं थी।

  • संसद और राष्ट्रीय परंपरा: भारत की संविधान सभा और बाद में संसद में भी ‘वंदे मातरम’ के इन्हीं दो पदों को आधिकारिक रूप से राष्ट्रगीत का दर्जा देकर स्वीकार किया गया।

पार्टी का रुख: “कांग्रेस 1937 के उस ऐतिहासिक और सर्वसम्मत फैसले पर आज भी अडिग है। हमारे कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत के उन्हीं दो आधिकारिक पदों का गायन होता है, जिन्हें संविधान सभा ने भी मान्यता दी थी।”