आवारा कुत्ते और रैबीज: कब जागेगा समाज और प्रशासन?

डॉ. चारू दीवान, रायपुर

कोरबा में पाँच वर्षीय मासूम की आवारा कुत्तों के झुंड द्वारा नोच-नोचकर हत्या और हाल ही में एक ही दिन में पाँच लोगों पर आवारा कुत्ते के हमले की घटना केवल समाचार नहीं हैं, बल्कि हमारी प्रशासनिक व्यवस्था और सामाजिक संवेदनशीलता पर गंभीर प्रश्नचिह्न हैं। ऐसे हादसे अब अपवाद नहीं रहे, बल्कि देश के अनेक शहरों में लगातार सामने आ रहे हैं। रायपुर सहित छत्तीसगढ़ के अधिकांश शहरी क्षेत्रों में आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या आम नागरिकों की सुरक्षा के लिए चिंता का विषय बन चुकी है।
यह विषय केवल पशु-प्रेम और पशु-क्रूरता के बीच बहस तक सीमित नहीं होना चाहिए। सबसे पहले मानव जीवन की सुरक्षा सर्वोपरि है। पशुओं के प्रति संवेदनशीलता आवश्यक है, लेकिन किसी भी सभ्य समाज में नागरिकों का भयमुक्त जीवन और सुरक्षित सार्वजनिक स्थान सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
रैबीज (Rabies) दुनिया की सबसे घातक संक्रामक बीमारियों में से एक है। यह संक्रमित कुत्ते, बिल्ली या अन्य स्तनधारी पशु के काटने अथवा उनकी लार के खुले घाव या श्लेष्मा झिल्ली के संपर्क में आने से फैलता है। यदि समय रहते उपचार न मिले और रोग के लक्षण विकसित हो जाएँ, तो अधिकांश मामलों में यह मृत्यु का कारण बनता है। रोग के अंतिम चरण में कई मरीजों में पानी पीने या पानी देखते ही गले में तीव्र ऐंठन और घबराहट होने लगती है, जिसे चिकित्सकीय भाषा में हाइड्रोफोबिया कहा जाता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार एशिया और अफ्रीका में रैबीज से होने वाली अधिकांश मौतों का कारण कुत्तों के काटने की घटनाएँ हैं। भारत भी इस चुनौती से अछूता नहीं है। हर वर्ष लाखों लोग कुत्तों के काटने के कारण एंटी-रैबीज उपचार लेने को विवश होते हैं। यह केवल स्वास्थ्य का नहीं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक बोझ का भी विषय है।

आवारा कुत्तों की समस्या का प्रभाव अनेक स्तरों पर दिखाई देता है। सुबह टहलने वाले नागरिक भय में रहते हैं। छोटे बच्चों को पार्कों में अकेले भेजने से अभिभावक डरते हैं। बुजुर्गों और महिलाओं पर हमले की घटनाएँ बढ़ रही हैं। अचानक सड़क पर आ जाने वाले कुत्तों के कारण दोपहिया वाहन दुर्घटनाएँ होती हैं, जिनमें कई बार गंभीर चोटें और मृत्यु तक हो जाती है।
समस्या का समाधान केवल भावनात्मक बहसों से नहीं निकलेगा। इसके लिए वैज्ञानिक, मानवीय और दीर्घकालिक नीति अपनानी होगी। नगर निगमों को आवारा कुत्तों की नियमित गणना, नसबंदी और व्यापक रैबीज टीकाकरण अभियान चलाने होंगे। खुले में फैले कचरे पर प्रभावी नियंत्रण आवश्यक है, क्योंकि यही आवारा पशुओं की संख्या बढ़ने का प्रमुख कारण बनता है। नागरिकों को भी जिम्मेदारी निभानी होगी कि वे सार्वजनिक स्थानों पर अनियंत्रित रूप से भोजन डालने के बजाय व्यवस्थित पशु-कल्याण कार्यक्रमों का समर्थन करें।
पालतू कुत्ते पालने वाले प्रत्येक व्यक्ति का यह कानूनी और नैतिक दायित्व है कि वह अपने पालतू पशु का समय-समय पर रैबीज टीकाकरण कराए, उसका रिकॉर्ड सुरक्षित रखे और उसे खुले में बिना नियंत्रण के न छोड़े।
यदि किसी व्यक्ति को कुत्ता काट ले, तो सबसे पहला कदम है—घाव को कम से कम 15 मिनट तक साबुन और बहते पानी से अच्छी तरह धोना। इसके बाद बिना किसी देरी के निकटतम स्वास्थ्य केंद्र या चिकित्सक से संपर्क कर एंटी-रैबीज वैक्सीन लगवानी चाहिए। आवश्यकता होने पर चिकित्सक रैबीज इम्यूनोग्लोबुलिन (RIG) भी देते हैं। उपचार में लापरवाही जानलेवा सिद्ध हो सकती है।चूकि मानव जीवन महत्वपूर्ण है, अतः कुत्ते के काटने पर यदि वह पालतू कुत्ता है और रैबीज विरोधी टीका उसे लगा है फिर भी 0,3,7,14,28 और 90 दिन मे मरीज को एन्टी रैबीज वैक्सीन लगवाना ही चाहिए।यहाँ 0 दिन से आशय है कि जिस तारीख को कुत्ते ने काटा है।जैसे यदि 26 जुलाई को कुत्ते ने काटा,तो 0 दिन 26 जुलाई है,फिर 3 दिन है 29 जुलाई,तदनुसार आगे दिनो की गणना करें । 6 वा याने 90 वे दिन वाला वैक्सीन वैकल्पिक होता है,जिसके लिए अपने डाक्टर से सलाह ले और जरूरी वैक्सीन अविलंब लगवाएँ ।

आज आवश्यकता इस बात की भी है कि इस विषय को राजनीतिक विवाद या भावनात्मक टकराव का माध्यम न बनाया जाए। पशु-कल्याण और मानव सुरक्षा दोनों साथ-साथ चल सकते हैं, बशर्ते प्रशासन अपनी जिम्मेदारी निभाए और समाज वैज्ञानिक सोच अपनाए।
एक सभ्य शहर की पहचान केवल चौड़ी सड़कों, ऊँची इमारतों और सुंदर उद्यानों से नहीं होती, बल्कि इस बात से होती है कि वहाँ बच्चे, महिलाएँ, बुजुर्ग और आम नागरिक बिना भय के सड़कों पर चल सकें। यदि लोग अपने ही मोहल्ले में सुबह की सैर करने से डरने लगें, तो यह केवल स्वास्थ्य का नहीं, बल्कि शहरी व्यवस्था का भी संकट है।

रैबीज पूर्णतः रोकी जा सकने वाली बीमारी है, लेकिन इसके लिए समय पर उपचार, जन-जागरूकता और प्रशासनिक इच्छाशक्ति आवश्यक है। अब समय आ गया है कि नगर निकाय, स्वास्थ्य विभाग, पशुपालन विभाग और नागरिक समाज मिलकर इस चुनौती का स्थायी समाधान खोजें। क्योंकि किसी भी लोकतांत्रिक समाज में मानव जीवन की सुरक्षा सर्वोच्च दायित्व है।