साइबर ठगी के पीछे म्यूल अकाउंट्स का बड़ा खेल: 35 बैंकों के कनेक्शन का खुलासा, ₹50,000 में बिक रहे फर्जी बैंक खाते
रायपुर।
जब भी देश में साइबर ठगी की वारदात होती है, तो सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि पीड़ितों का पैसा आखिरकार कहाँ गायब हो जाता है? पुलिस द्वारा खाते फ्रीज करने के बावजूद ठगी की रकम वापस क्यों नहीं मिल पाती? इस पूरे खेल का मुख्य जरिया है—म्यूल अकाउंट्स (Mule Accounts) का संगठित गिरोह।
क्या हैं म्यूल अकाउंट्स?
म्यूल अकाउंट्स ऐसे फर्जी या किराए पर लिए गए बैंक खाते होते हैं, जिनका इस्तेमाल साइबर ठग अवैध लेन-देन, मनी लॉन्ड्रिंग और ठगी की रकम को तेजी से कई खातों में ट्रांसफर करने के लिए करते हैं।
35 प्रमुख बैंकों से जुड़ा नेटवर्क
हालिया रिपोर्ट्स और खुलासों के अनुसार, देश के लगभग 35 बड़े प्राइवेट और सरकारी बैंकों के कर्मचारियों व एजेंटों का एक सिंडिकेट इन ठगों के लिए काम कर रहा है। इसमें कुछ प्रमुख बैंकों के कर्मचारियों और एजेंटों पर फर्जी खाते सीधे ठगों को उपलब्ध कराने के गंभीर आरोप लगे हैं।
जानिए फर्जीवाड़े का रेट लिस्ट और सुविधाएं
बैंक कर्मचारियों और बिचौलियों के बीच इस फर्जीवाड़े की पूरी रेट लिस्ट तय है:
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₹50,000 में एक खाता: ठगों को चालू (Current) और बचत (Savings) खाते तैयार करके बेचने के बदले ₹50,000 प्रति अकाउंट तक वसूले जाते हैं।
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खाता अनफ्रीज करने का दावा: यदि साइबर सेल या पुलिस किसी संदेहास्पद म्यूल अकाउंट को फ्रीज कर देती है, तो यह सिंडिकेट रिश्वत लेकर उस खाते को दोबारा अनफ्रीज कराने तक का दावा करता है।
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फर्जी डॉक्यूमेंटेशन: बिना किसी वास्तविक बैकग्राउंड वेरिफिकेशन (KYC) के, सिर्फ कमीशन और मोटी रकम के दम पर ये फर्जी अकाउंट तुरंत एक्टिव कर दिए जाते हैं।
जांच एजेंसियों के सामने बड़ी चुनौती
जब तक पुलिस या साइबर सेल ठगी की शिकायत पर किसी म्यूल अकाउंट को ट्रैक करती है, तब तक अपराधी उस रकम को दर्जनों अन्य फर्जी खातों में बांट चुके होते हैं या फिर क्रिप्टो करेंसी व एटीएम के जरिए निकाल चुके होते हैं। म्यूल अकाउंट्स का यही मजबूत ढांचा देश में बढ़ते साइबर अपराधों की सबसे बड़ी वजह बना हुआ है।
