बांकीपुर उपचुनाव में प्रशांत किशोर की ऐतिहासिक जीत, 30 साल बाद भाजपा का गढ़ ढहा
August 5, 2026 upi24 news
पटना, 5 अगस्त 2026। बिहार की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। पटना की बांकीपुर विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर (पीके) ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को 30 वर्षों बाद इस सीट पर पराजित कर अपनी पहली चुनावी जीत दर्ज की। उन्होंने भाजपा उम्मीदवार नीरज सिन्हा को 19,323 वोटों के अंतर से हराया। लंबे समय से भाजपा का मजबूत गढ़ मानी जाने वाली इस सीट पर आए परिणाम को आगामी बिहार विधानसभा चुनाव से पहले महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत माना जा रहा है।
चुनाव परिणाम
उपचुनाव में प्रशांत किशोर को 64,151 वोट (49.23 प्रतिशत) मिले, जबकि भाजपा उम्मीदवार नीरज सिन्हा को 44,827 वोट (34.40 प्रतिशत) प्राप्त हुए। राजद उम्मीदवार रेखा गुप्ता 14,273 वोट (10.95 प्रतिशत) के साथ तीसरे स्थान पर रहीं।
मतदान में दर्ज हुई गिरावट
2025 के विधानसभा चुनाव में बांकीपुर सीट पर 41.39 प्रतिशत मतदान हुआ था और कुल 1,56,647 वोट पड़े थे। वहीं इस उपचुनाव में मतदान घटकर 34.30 प्रतिशत रह गया और कुल 1,30,313 वोट डाले गए। यानी पिछली बार की तुलना में लगभग 26 हजार कम मतदाताओं ने मतदान किया।
भाजपा को सबसे बड़ा नुकसान
2025 के विधानसभा चुनाव में भाजपा उम्मीदवार नितिन नवीन को 98,299 वोट मिले थे, जबकि इस उपचुनाव में भाजपा उम्मीदवार नीरज सिन्हा को केवल 44,827 वोट ही प्राप्त हुए। यानी भाजपा के वोटों में लगभग 53 हजार की गिरावट दर्ज की गई।
दूसरी ओर, जन सुराज को पिछले चुनाव में मात्र 7,717 वोट मिले थे, जबकि इस बार प्रशांत किशोर ने 64,151 वोट हासिल कर पार्टी के वोट बैंक में 56 हजार से अधिक वोटों की बढ़ोतरी दर्ज की।
राजद को भी बड़ा नुकसान हुआ। वर्ष 2025 में पार्टी को 46,363 वोट मिले थे, जो इस उपचुनाव में घटकर 14,273 रह गए।
भाजपा की हार के प्रमुख कारण
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार भाजपा की हार के पीछे कई कारण रहे। उम्मीदवार बदलने से संगठन में भ्रम की स्थिति बनी और अंतिम समय में नीरज सिन्हा को उम्मीदवार बनाए जाने का असर चुनाव पर दिखाई दिया। स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं की नाराजगी और अपेक्षित चुनावी सक्रियता नहीं दिखी। इसके अलावा अत्यधिक आत्मविश्वास के कारण भाजपा समर्थकों का मतदान प्रतिशत भी प्रभावित हुआ।
युवा मतदाताओं के बीच बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं, पेपर लीक और छात्र आंदोलनों जैसे मुद्दों को लेकर असंतोष भी भाजपा के खिलाफ गया। साथ ही पार्टी का पारंपरिक शहरी वोट बैंक पूरी तरह एकजुट नहीं दिखाई दिया।
प्रशांत किशोर की जीत के कारण
प्रशांत किशोर ने चुनाव प्रचार के दौरान जातीय समीकरणों के बजाय स्थानीय मुद्दों को प्रमुखता दी। उन्होंने सड़क, जलभराव, सफाई, ट्रैफिक, शिक्षा, रोजगार और पलायन जैसे विषयों पर लगातार अभियान चलाया।
उन्होंने कॉलेज, कोचिंग संस्थानों, पार्क और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर युवाओं से सीधे संवाद किया तथा सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म का भी प्रभावी उपयोग किया। भाजपा और राजद दोनों से असंतुष्ट मतदाताओं का बड़ा वर्ग जन सुराज के पक्ष में एकजुट होता दिखाई दिया।
राजद तीसरे स्थान पर सिमटी
राजद इस चुनाव में प्रभावी चुनौती पेश नहीं कर सकी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कमजोर संगठन, सीमित चुनाव प्रचार, पुराने चेहरे पर भरोसा और मतदाताओं का जीतने वाले उम्मीदवार की ओर झुकाव पार्टी के कमजोर प्रदर्शन की बड़ी वजह रहा।
भाजपा के दिग्गज नेताओं के बूथों पर भी झटका
चुनाव परिणामों में भाजपा को उन क्षेत्रों में भी पीछे रहना पड़ा, जिन्हें पार्टी का मजबूत आधार माना जाता था। कई वरिष्ठ नेताओं के प्रभाव वाले बूथों पर भी जन सुराज को बढ़त मिली, जिसने इस जीत को और अधिक राजनीतिक महत्व दे दिया।
बदलते राजनीतिक समीकरणों का संकेत
बांकीपुर उपचुनाव का परिणाम बिहार की राजनीति में नए राजनीतिक समीकरणों का संकेत माना जा रहा है। भाजपा के लिए यह संगठन और उम्मीदवार चयन पर पुनर्विचार का संदेश है, जबकि राजद के लिए शहरी क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत करने की चुनौती सामने आई है। वहीं जन सुराज के लिए यह जीत पार्टी की पहली बड़ी चुनावी सफलता मानी जा रही है, जिससे आगामी विधानसभा चुनावों में उसकी राजनीतिक भूमिका और मजबूत हो सकती है।
