वोटिंग से पहले अमेरिका का ईरान पर बड़ा हमला! केश्म द्वीप पर 5 जोरदार धमाके, ईरान ने दो अमेरिकी जासूसी ड्रोन मार गिराने का किया दावा

मिडटर्म चुनाव से पहले पश्चिम एशिया में फिर बढ़ा युद्ध का खतरा, होर्मुज स्ट्रेट और वैश्विक तेल सप्लाई पर मंडराया संकट; ट्रम्प ने समझौते की जताई उम्मीद

तेहरान/वॉशिंगटन। अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव एक बार फिर गंभीर मोड़ पर पहुंचता दिखाई दे रहा है। अमेरिकी मिडटर्म चुनाव में मतदान से कुछ घंटे पहले सोमवार को ईरान के रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण केश्म द्वीप पर कम से कम पांच जोरदार धमाकों की खबर सामने आई है। इसके अलावा बंदर लेंगेह शहर में भी विस्फोट की सूचना मिली है। अमेरिकी अखबार वॉल स्ट्रीट जर्नल ने अधिकारियों के हवाले से दावा किया है कि इन हमलों के पीछे अमेरिका का हाथ हो सकता है। हालांकि, ईरान की ओर से अभी तक हमले के लिए अमेरिका या इजराइल को आधिकारिक रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया गया है।

इस घटनाक्रम के बीच ईरानी मीडिया ने दावा किया है कि उसकी सेना ने अमेरिका के दो MQM-170 जासूसी ड्रोन मार गिराए हैं। ईरान के सरकारी प्रसारण चैनल IRIB की ओर से ड्रोन गिराए जाने से संबंधित फुटेज भी जारी किए जाने की बात कही गई है। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है। लगातार धमाकों और हमले की खबरों के बाद इलाके में सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है। स्थानीय स्तर पर पेट्रोल पंपों पर वाहनों की कतारें लगने और लोगों द्वारा ईंधन का भंडारण किए जाने की खबरें भी सामने आई हैं।

अमेरिका के लिए क्यों महत्वपूर्ण है केश्म द्वीप?

ईरान का केश्म द्वीप लगभग 1,445 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है और यह देश का सबसे बड़ा द्वीप है। फारस की खाड़ी और होर्मुज स्ट्रेट के प्रवेश क्षेत्र के नजदीक स्थित होने के कारण इसका सैन्य और सामरिक महत्व बेहद अधिक है। पहले यह द्वीप पर्यटन और फ्री ट्रेड जोन के रूप में जाना जाता था, लेकिन समय के साथ यहां सैन्य गतिविधियों और रणनीतिक ठिकानों का महत्व बढ़ गया है।

रिपोर्टों के अनुसार, द्वीप के आसपास भूमिगत सुरंगों और नमक की गुफाओं का नेटवर्क मौजूद है। माना जाता है कि ईरान ने इस क्षेत्र में तटीय मिसाइल प्रणालियों और तेज गति से हमला करने वाली नौकाओं के लिए सुरक्षित ठिकाने विकसित किए हैं। यहां से होर्मुज स्ट्रेट में आने-जाने वाले समुद्री जहाजों की गतिविधियों पर नजर रखी जा सकती है।

होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल और गैस परिवहन मार्गों में शामिल है। वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री रास्ते से गुजरता है। ऐसे में यहां किसी भी प्रकार का सैन्य संघर्ष अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों को प्रभावित कर सकता है।

ट्रम्प ने समझौते की जताई उम्मीद

हमले की खबरों से पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा था कि अमेरिका फिलहाल ईरान पर दोबारा हमला करने की तैयारी नहीं कर रहा है। उन्होंने ईरान के साथ संभावित समझौते की उम्मीद भी जताई थी।

जब ट्रम्प से पूछा गया कि क्या अमेरिकी मिडटर्म चुनाव के बाद ईरान पर हमला करने की योजना है, तो उन्होंने इससे इनकार किया। ट्रम्प ने सोशल मीडिया पर दावा किया कि ईरान के साथ बड़े युद्ध की आशंका कम होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगभग 10 डॉलर प्रति बैरल की गिरावट आई है।

फरवरी से शुरू हुआ संघर्ष, कई देशों तक फैला युद्ध

अमेरिका और इजराइल ने 28 फरवरी 2026 को ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किया था। अमेरिका ने इसे ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ और इजराइल ने ‘ऑपरेशन रोरिंग लायन’ नाम दिया। इन अभियानों के दौरान ईरान के परमाणु ठिकानों, मिसाइल प्रणालियों, सैन्य अड्डों और कमांड सेंटरों को निशाना बनाया गया।

इन हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई और कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों के मारे जाने की खबर सामने आई थी। इसके बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए इजराइल और खाड़ी क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए।

बहरीन, सऊदी अरब, कतर, संयुक्त अरब अमीरात और कुवैत जैसे देशों में भी संघर्ष का असर देखने को मिला। इससे पश्चिम एशिया की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए।

होर्मुज स्ट्रेट बना दुनिया की चिंता

ईरान और अमेरिका के बीच संघर्ष का सबसे बड़ा असर वैश्विक समुद्री व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ा है। होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ी है।

अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों और वहां आने-जाने वाले जहाजों पर नौसैनिक नाकाबंदी की कार्रवाई की, जबकि ईरान ने समुद्री मार्ग पर अपनी रणनीतिक पकड़ बनाए रखने की कोशिश की। इससे कई जहाजों को अपने रास्ते बदलने पड़े।

भारत जैसे देश, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर कच्चे तेल का आयात करते हैं, इस तनाव से विशेष रूप से प्रभावित हो सकते हैं। तेल की कीमतों में तेजी आने पर पेट्रोल-डीजल, परिवहन, उद्योग और महंगाई पर भी असर पड़ने की आशंका रहती है।

युद्धविराम की कोशिशें भी नहीं ला सकीं स्थायी शांति

अप्रैल 2026 में पाकिस्तान की मध्यस्थता से अमेरिका और ईरान के बीच दो सप्ताह के युद्धविराम पर सहमति बनी थी। इसके बाद इस्लामाबाद में दोनों पक्षों के प्रतिनिधियों के बीच बातचीत हुई, लेकिन परमाणु कार्यक्रम और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर सहमति नहीं बन सकी।

जून में भी समझौते की दिशा में प्रयास किए गए। हालांकि, अगस्त तक तनाव फिर बढ़ गया। कतर की मध्यस्थता से बातचीत आगे बढ़ाने की कोशिशें जारी रहीं, लेकिन 2 नवंबर को दोहा में हुई वार्ता भी किसी ठोस समझौते तक नहीं पहुंच सकी।

47 अरब डॉलर से अधिक खर्च का दावा, हजारों लोगों की मौत

रिपोर्ट के मुताबिक, इस संघर्ष में अमेरिका का सैन्य खर्च 47 अरब डॉलर से अधिक पहुंच चुका है। वहीं ईरान, लेबनान और खाड़ी क्षेत्र के विभिन्न हिस्सों में हजारों लोगों की मौत और बड़ी संख्या में लोगों के घायल तथा विस्थापित होने की खबरें सामने आई हैं।

अब दुनिया की नजर अगले कदम पर

केश्म द्वीप पर धमाकों और अमेरिकी ड्रोन गिराने के ईरान के दावे के बाद पश्चिम एशिया में तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या अमेरिका और ईरान बातचीत के जरिए समाधान निकालेंगे या यह संघर्ष फिर बड़े सैन्य टकराव में बदल जाएगा।

यदि होर्मुज स्ट्रेट में तनाव और बढ़ता है तो इसका असर केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारत सहित पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था, ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर पड़ सकता है। फिलहाल दुनिया की नजर अमेरिका और ईरान के अगले कदम पर टिकी हुई है।