चक्रधर समारोह 2026: खैरागढ़ विश्वविद्यालय के कलाकारों ने ओडिसी, कथक और भरतनाट्यम से बांधा समां

रायपुर (21 सितंबर 2026): रायगढ़ में आयोजित 41वें अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त चक्रधर समारोह-2026 की सातवीं सांस्कृतिक संध्या में शास्त्रीय कला का अद्भुत संगम देखने को मिला। इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ के नृत्य संकाय के विद्यार्थियों ने ओडिसी, भरतनाट्यम और कथक की मनोहारी प्रस्तुतियों से मंच को भारतीय संस्कृति के विविध रंगों से सजा दिया। भाव, लय, ताल और नृत्य मुद्राओं के सुंदर समन्वय ने दर्शकों को भावविभोर कर दिया।

गणेश वंदना से हुई ओडिसी नृत्य की शुरुआत

सांस्कृतिक संध्या का शुभारंभ ओडिसी नृत्य विभाग के विद्यार्थियों द्वारा प्रस्तुत ‘गणेश वंदना’ से हुआ। श्री सुशांत कुमार दास के नृत्य निर्देशन में कलाकारों (जया निर्मलकर, सुधा योजन, प्रज्ञा प्रसाद, मीरा वर्मा, दुर्गा प्रसाद, लीना धनकर और रिकी टुडू) ने ‘एकदन्तो लम्बोदरो विघ्नविनाशको देवः’ पर भगवान गणेश की आराधना को जीवंत रूप दिया।

भरतनाट्यम में दिखी शास्त्रीय लयकारी

ओडिसी के बाद भरतनाट्यम विभाग के विद्यार्थियों ने ‘नृत्यांजलि’ प्रस्तुत की। लावण्या आनंद द्वारा रचित और डॉ. मेदिनी होम्बल एवं श्री होरिल गौर द्वारा संयोजित इस प्रस्तुति में होरिल गौर, प्रीति चौधरी, खुशबू भुमिज, अनुकृति सिंह, अवनि जैन, अदिति शर्मा, अंजलि चौहान और यामिनी निषाद की भाव-भंगिमाओं ने खूब तालियां बटोरीं।

‘भारत के रंग’ में सांस्कृतिक विविधता का संगम

कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण ‘भारत के रंग’ की प्रस्तुति रही। इसमें भरतनाट्यम, कथक और ओडिसी तीनों शास्त्रीय नृत्य शैलियों के माध्यम से ‘वंदे मातरम्’ की भावभूमि को मंच पर साकार किया गया। श्री सुशांत कुमार दास के निर्देशन एवं श्री होरिल गौर के सह-निर्देशन में देश की विविधता और सांस्कृतिक एकता की सुंदर झलक देखने को मिली।

शिव वंदना में कथक का आध्यात्मिक सौंदर्य

संध्या के अंतिम पड़ाव में कथक विभाग के विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों ने पद्मविभूषण स्वर्गीय पं. बिरजू महाराज द्वारा राग हंसध्वनि और तीनताल में रचित “निरतत शंकर पार्वती संग” पर आधारित शिव वंदना प्रस्तुत की। पद संचालन, लयकारी और उत्कृष्ट भावाभिव्यक्ति के माध्यम से भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य स्वरूप का मंचन किया गया।

खैरागढ़ विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों की इन प्रस्तुतियां और उनकी वर्षों की साधना ने 41वें चक्रधर समारोह की सातवीं सांस्कृतिक संध्या को स्मरणीय बना दिया।