लोकधुनों से सजा ‘रंग-तरंग’, पारंपरिक वाद्यों और आधुनिक संगीत का दिखा अनूठा संगम
रायपुर। छत्तीसगढ़ की लोकसंगीत परंपरा, पारंपरिक वाद्ययंत्रों और आधुनिक संगीत की विविध शैलियों को एक साथ मंच देने वाले तीन दिवसीय सांस्कृतिक आयोजन ‘रंग-तरंग’ का मंगलवार को महंत घासीदास संग्रहालय परिसर स्थित मुक्ताकाशी मंच पर शुभारंभ हुआ। पहले दिन कलाकारों की प्रस्तुतियों में लोकधुनों की मिठास, शास्त्रीय वाद्यों की मधुरता और आधुनिक संगीत के प्रयोगों का खूबसूरत मेल देखने को मिला।
1 से 3 सितंबर तक चलेगा आयोजन
संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग की ओर से आयोजित ‘रंग-तरंग’ कार्यक्रम प्रतिदिन शाम 7 बजे से आयोजित किया जा रहा है। आयोजन का मुख्य उद्देश्य छत्तीसगढ़ की पारंपरिक लोक एवं वाद्य संगीत विरासत को संरक्षित करना, उसे युवा पीढ़ी तक पहुंचाना और इस क्षेत्र से जुड़े कलाकारों को अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने के लिए बेहतर मंच उपलब्ध कराना है।
पहले दिन कलाकारों ने बांधा समां
कार्यक्रम के उद्घाटन दिवस पर लोकवादन से लेकर पियानो, तबला, बांसुरी और लोकगायन तक विभिन्न प्रस्तुतियां हुईं। विवेकानंद भारती एवं साथियों ने लोकवाद्य फ्यूजन की प्रस्तुति देकर कार्यक्रम की शुरुआत को खास बनाया। इसके बाद मोहम्मद अयान रायकर ने पियानो वादन, नासिर खान, अंबिकापुर ने तबला वादन और तारकेश्वर वर्मा, रायपुर ने बांसुरी वादन से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया। लोकगायक राहुल ठाकुर, रायपुर की प्रस्तुति ने भी दर्शकों की खूब सराहना बटोरी।
कार्यक्रम में पारंपरिक लोकधुनों और वाद्ययंत्रों को आधुनिक संगीत के साथ जोड़कर पेश किया गया। इससे छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विविधता के साथ-साथ संगीत में किए जा रहे नए प्रयोग भी सामने आए। मुक्ताकाशी मंच पर देर शाम तक सुरों की यह महफिल दर्शकों के आकर्षण का केंद्र बनी रही।
लोकवाद्य हमारी सांस्कृतिक पहचान : डॉ. संजय कन्नौजे
संस्कृति एवं पुरातत्व संचालक डॉ. संजय कन्नौजे ने कहा कि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान उसकी लोकपरंपराओं और लोकसंगीत से गहराई से जुड़ी हुई है। यहां के पारंपरिक वाद्ययंत्र केवल मनोरंजन अथवा संगीत प्रस्तुति के साधन नहीं, बल्कि प्रदेश के लोकजीवन, परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान के महत्वपूर्ण प्रतीक हैं।
उन्होंने कहा कि ‘रंग-तरंग’ के जरिए पारंपरिक संगीत को नए अंदाज में प्रस्तुत करने की पहल की गई है। लोकधुनों और पारंपरिक वाद्यों को आधुनिक संगीत के साथ जोड़ने से युवा पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने में मदद मिलेगी। साथ ही, इससे स्थानीय कलाकारों को अपनी प्रतिभा को बड़े मंच पर प्रस्तुत करने और नई पहचान बनाने के अवसर मिलेंगे।
डॉ. कन्नौजे ने कहा कि कलाकारों को लगातार मंच और प्रोत्साहन मिलना जरूरी है। ऐसे आयोजनों से कलाकारों का मनोबल बढ़ता है और उन्हें अपनी कला को व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुंचाने का अवसर मिलता है। संस्कृति विभाग का प्रयास है कि लोक एवं वाद्य संगीत से जुड़े कलाकारों को निरंतर प्रोत्साहित किया जाए।
उन्होंने कहा कि बदलते समय के साथ परंपराओं को नए प्रयोगों से जोड़ना आवश्यक है। पारंपरिक संगीत को आधुनिक प्रस्तुति शैली के साथ सामने लाने से युवा वर्ग भी लोकसंगीत की ओर आकर्षित होगा। ‘रंग-तरंग’ इसी सोच को आगे बढ़ाने वाला मंच है।
कला प्रेमियों की रही मौजूदगी
कार्यक्रम के शुभारंभ अवसर पर संस्कृति एवं पुरातत्व संचालक डॉ. संजय कन्नौजे, संस्कृति उपसंचालक उमेश मिश्रा, वरिष्ठ पत्रकार एवं छायाकार दीपेंद्र दीवान, समाजसेवी उदय भान सिंह चौहान, साहित्यकार शकुंतला तर्रार, साहित्यकार अरविंद मिश्र सहित बड़ी संख्या में कला, साहित्य और संस्कृति प्रेमी उपस्थित रहे।
आयोजन के आगामी दो दिनों में भी विभिन्न कलाकार संगीत और वाद्य प्रस्तुतियों के माध्यम से छत्तीसगढ़ की लोकपरंपराओं और सांस्कृतिक विरासत के विविध रंग दर्शकों के सामने प्रस्तुत करेंगे।
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