रायपुर : विशेष लेख | जब सरकार पहुंची गांव की चौपाल तक, तब तिहारू ने जाना—यही है सुराज

सुशासन का अर्थ केवल सरकारी योजनाओं और घोषणाओं तक सीमित नहीं है। उसका वास्तविक मूल्य तब सामने आता है, जब शासन की संवेदनशीलता उस व्यक्ति तक पहुंचे, जो राजधानी से दूर किसी गांव में अपनी रोजमर्रा की जरूरतों और समस्याओं के साथ जीवन बिता रहा है। जब कोई ग्रामीण बिना संकोच अपने मुख्यमंत्री के सामने खड़े होकर पूछ सके कि उसे राशन समय पर मिल रहा है या नहीं, गांव का हैंडपंप चल रहा है या नहीं, सड़क बनी है या नहीं और स्कूल में शिक्षक नियमित आ रहे हैं या नहीं—तभी लोकतांत्रिक शासन का संवाद वास्तविक अर्थों में मजबूत होता है।

छत्तीसगढ़ में आयोजित ‘सुशासन तिहार’ ने इसी भावना को जमीन पर उतारने का प्रयास किया। यह अभियान शासन को लोगों के दरवाजे तक ले जाने, उनकी समस्याओं को सीधे सुनने और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन की वास्तविक स्थिति जानने का माध्यम बना।

बस्तर के आयतु से लेकर सरगुजा के तिहारू और धमतरी के नगरी अंचल के ईतवारी राम कमार तक, अलग-अलग अंचलों के ग्रामीणों को यह अवसर मिला कि वे अपने क्षेत्र की जरूरतों और समस्याओं को सीधे शासन के सामने रख सकें। यही सुशासन की सबसे बड़ी कसौटी है—जनता को अपनी बात कहने के लिए व्यवस्था के पास जाने की जरूरत न पड़े, बल्कि व्यवस्था स्वयं जनता तक पहुंचे।

चौपाल में बदला सरकारी दफ्तर का रास्ता

सुशासन तिहार के दौरान गांवों में आयोजित चौपालें महज बैठकें नहीं थीं। वे सरकार और समाज के बीच सीधे संवाद का मंच बनीं। ग्रामीणों ने पेयजल, सड़क, बिजली, स्कूल, आंगनबाड़ी, सामुदायिक भवन, तालाब और सार्वजनिक सुविधाओं से जुड़ी समस्याएं खुलकर सामने रखीं।

कहीं हैंडपंप की जरूरत थी, तो कहीं तालाब में घाट निर्माण की मांग। किसी गांव में पहुंच मार्ग की समस्या थी, तो किसी जगह विद्युत लाइन के विस्तार की आवश्यकता। बच्चों के मध्यान्ह भोजन और स्कूलों में शिक्षकों की उपस्थिति जैसे विषय भी ग्रामीणों ने सामने रखे।

इन छोटी दिखने वाली जरूरतों का ग्रामीण जीवन में कितना बड़ा महत्व है, इसे समझना ही संवेदनशील प्रशासन की पहचान है।

जब मुख्यमंत्री अचानक गांव पहुंचे

सुशासन तिहार की सबसे प्रभावी तस्वीरों में से एक वह रही, जब मुख्यमंत्री विष्णु देव साय अचानक ग्रामीणों के बीच पहुंचे। कई स्थानों पर हेलीकॉप्टर से मुख्यमंत्री का गांव में पहुंचना ग्रामीणों के लिए कौतूहल का विषय बना, लेकिन इसके बाद जो दृश्य सामने आया, वह उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण था।

मुख्यमंत्री को अपने बीच देखकर ग्रामीणों ने सहज होकर अपनी समस्याएं साझा कीं। तपती गर्मी के बीच गांव की चौपाल में मुख्यमंत्री का लोगों के साथ बैठना और उनकी बात सुनना शासन की उस अवधारणा को मजबूत करता है, जिसमें जनता सर्वोच्च प्राथमिकता होती है।

कई सार्वजनिक जरूरतों पर मौके पर ही निर्णय लेकर मुख्यमंत्री ने यह संदेश भी दिया कि प्रशासनिक प्रक्रिया का उद्देश्य समस्या को लंबित रखना नहीं, बल्कि समाधान तक पहुंचाना होना चाहिए।

गांव-गांव पहुंचा प्रशासनिक अमला

इस वर्ष सुशासन तिहार का आयोजन 1 मई से 10 जून 2026 तक प्रदेशभर में किया गया। सभी 33 जिलों के 146 विकासखंडों में अभियान दलों का गठन किया गया। अधिकारियों और कर्मचारियों ने गांवों का दौरा कर ग्रामीणों से सीधे संवाद किया।

प्रदेश की करीब 11,693 ग्राम पंचायतों के अंतर्गत आने वाले लगभग 19,820 गांवों तक अभियान की पहुंच बनाने का प्रयास किया गया। विभिन्न विभागों के अधिकारी-कर्मचारी गांवों में पहुंचे, ग्रामीणों से बातचीत की और कई स्थानों पर रात्रि विश्राम कर स्थानीय परिस्थितियों को करीब से समझा।

यह प्रक्रिया इसलिए महत्वपूर्ण रही क्योंकि फाइलों और रिपोर्टों में दर्ज आंकड़ों के बजाय प्रशासन को योजनाओं की वास्तविक स्थिति गांव के लोगों से जानने का अवसर मिला।

योजनाओं की जमीन पर हकीकत परखी गई

सुशासन तिहार को केवल शिकायत सुनने तक सीमित नहीं रखा गया। अभियान के दौरान विभिन्न सरकारी योजनाओं और कार्यक्रमों के क्रियान्वयन की भी समीक्षा की गई।

सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत अंत्योदय अन्न योजना, खाद्यान्न के भंडारण और वितरण की स्थिति तथा दूरस्थ क्षेत्रों में मानसून से पहले आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता की जांच की गई। बीपीएल परिवारों के लिए अमृत नमक वितरण की स्थिति भी देखी गई।

इस तरह अभियान ने यह जानने का प्रयास किया कि सरकारी योजना कागज पर स्वीकृत होने के बाद वास्तव में हितग्राही तक किस स्थिति में पहुंच रही है।

मजदूरी से लेकर नामांतरण तक, हर जरूरी विषय की समीक्षा

ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर भी विशेष ध्यान दिया गया। मनरेगा और अन्य रोजगारमूलक कार्यों की प्रगति तथा श्रमिकों को मजदूरी भुगतान की स्थिति की समीक्षा की गई।

राजस्व विभाग से जुड़े विवाद रहित नामांतरण, बंटवारा और सीमांकन जैसे मामलों की स्थिति भी जांची गई। पेयजल स्रोतों की सफाई, स्वच्छता अभियान, विद्युत व्यवस्था, ट्रांसफार्मरों और बिजली लाइनों के रखरखाव तथा कृषि पंपों के विद्युतीकरण से जुड़े कार्यों की भी पड़ताल हुई।

एकल बत्ती कनेक्शन, चिकित्सा सुविधाएं, सामाजिक सुरक्षा योजनाएं, पेंशन और निराश्रित पेंशन जैसे विषय भी समीक्षा के केंद्र में रहे।

जनप्रतिनिधियों से लेकर अफसरों तक, सभी की भागीदारी

सुशासन तिहार को व्यापक स्वरूप देने के लिए त्रिस्तरीय पंचायती राज संस्थाओं के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को भी अभियान से जोड़ा गया। मुख्यमंत्री के साथ जिलों के प्रभारी मंत्रियों और प्रभारी सचिवों ने भी विभिन्न क्षेत्रों का दौरा किया।

आकस्मिक निरीक्षण और मैदानी संवाद के माध्यम से योजनाओं की प्रगति का जायजा लिया गया। इससे प्रशासनिक व्यवस्था में जवाबदेही और मैदानी स्तर पर निगरानी को मजबूती देने का प्रयास हुआ।

सुशासन की असली पहचान—जनता का भरोसा

सुशासन तिहार की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल कितनी शिकायतें सुनी गईं या कितने आवेदन प्राप्त हुए, यह नहीं है। इसकी असली सफलता इस बात में है कि शासन और जनता के बीच संवाद कितना सहज हुआ और लोगों का भरोसा कितना मजबूत हुआ।

जब तिहारू जैसे ग्रामीण को यह महसूस होता है कि वह अपने मुख्यमंत्री के सामने अपनी बात सीधे रख सकता है, जब गांव का किसान अपनी बिजली और सिंचाई की समस्या खुलकर बता सकता है और जब एक परिवार राशन या पेंशन की समस्या के समाधान के लिए प्रशासन तक आसानी से पहुंच सकता है, तब सुशासन की अवधारणा जमीन पर दिखाई देती है।

सुराज आखिर वही है, जहां सरकार केवल शासन नहीं करती, बल्कि सुनती है, समझती है और समाधान के लिए जनता के बीच खड़ी दिखाई देती है। सुशासन तिहार ने इसी भरोसे को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम रखा है।