148 साल पुराने ‘सुपर अल नीनो’ का खतरा: समुद्र का तापमान 2°C बढ़ने से क्या भारत में आएगा भीषण सूखा?
नई दिल्ली / प्रशांत महासागर: मौसम वैज्ञानिकों ने दुनिया भर में एक बार फिर भीषण मौसमी बदलाव को लेकर बड़ी चेतावनी जारी की है। प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) का तापमान सामान्य से करीब 2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ चुका है, जिसने 148 साल पुराने एक खौफनाक इतिहास की यादें ताजा कर दी हैं। यह स्थिति ‘सुपर अल नीनो’ (Super El Niño) की ओर इशारा कर रही है, जिसका सीधा असर भारत के मानसून, खेती और खाद्य सुरक्षा पर पड़ सकता है।
क्या है 1876-78 का वह खौफनाक इतिहास?
इतिहास के पन्नों को पलटें तो साल 1876 से 1878 के बीच दुनिया ने ऐसा ही एक खतरनाक ‘सुपर अल नीनो’ देखा था। उस दौरान प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से 3 डिग्री सेल्सियस अधिक गर्म हो गया था। इसके परिणामस्वरूप:
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भारत में महा-अकाल: मानसून पूरी तरह फेल हो गया था, जिससे देश में भीषण सूखा पड़ा।
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55 लाख से ज्यादा मौतें: इस अकाल और भुखमरी के कारण भारत में 55 लाख से अधिक लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी।
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ग्लोबल तबाही: सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया का मौसम चक्र बिगड़ गया था।
समुद्र के उबलने से कैसे मचती है तबाही?
अल नीनो एक ऐसी प्राकृतिक घटना है जिसमें प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय क्षेत्र में समुद्र की सतह का पानी सामान्य से बहुत ज्यादा गर्म हो जाता है। जब यह तापमान 2°C या उससे ज्यादा बढ़ जाता है, तो इसे ‘सुपर अल नीनो’ कहा जाता है।
असर: इसके कारण हवाओं का रुख बदल जाता है। जहां भारी बारिश होनी चाहिए (जैसे भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया), वहां सूखा पड़ने लगता है। इसके विपरीत, दुनिया के कुछ अन्य हिस्सों में विनाशकारी बाढ़ आ जाती है।
भारत पर मंडरा रहा है कैसा संकट?
यदि मौजूदा हालात और बिगड़ते हैं, तो भारत को निम्नलिखित मोर्चों पर बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है:
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कृषि संकट (Agriculture Crisis): भारतीय खेती का एक बड़ा हिस्सा मानसून की बारिश पर निर्भर है। मानसून कमजोर होने से खरीफ की फसलों (जैसे धान, दलहन) के उत्पादन में भारी गिरावट आ सकती है।
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खाद्य संकट और महंगाई (Food Crisis & Inflation): फसलों के नुकसान से अनाज की कमी हो सकती है, जिससे देश में खाद्य सामग्री के दाम तेजी से बढ़ सकते हैं।
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पानी की किल्लत (Water Scarcity): जलाशयों और ग्राउंड वाटर का स्तर गिरने से पीने के पानी और सिंचाई के लिए हाहाकार मच सकता है।
वैज्ञानिक लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं ताकि समय रहते इस संभावित आपदा से निपटने के लिए कदम उठाए जा सकें।
