हाई कोर्ट ने पारिवारिक न्यायालयों की भूमिका पर जोर दिया

मुख्य न्यायाधीश ने कहा: निर्णय के साथ परिवारिक सौहार्द की पुनर्स्थापना भी आवश्यक

राज्य के हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने पारिवारिक न्यायालयों की भूमिका पर बल दिया है। उन्होंने कहा कि पारिवारिक न्यायालयों का उद्देश्य केवल विवादों का निपटारा करना नहीं, बल्कि परिवारिक सौहार्द को बहाल और बनाए रखना भी है।

न्यायिक कार्य के साथ सामाजिक जिम्मेदारी

मुख्य न्यायाधीश के अनुसार, परिवार से जुड़े विवाद अक्सर भावनात्मक स्तर पर गहरे होते हैं। इसलिए, न्यायालयों को

  • समझौते की संभावनाओं
  • परामर्श
  • और मध्यस्थता
    जैसे उपकरणों का अधिक उपयोग करना चाहिए, ताकि निर्णय केवल कानूनी राहत तक सीमित न रहे, बल्कि संबंधों में स्थिरता भी लौट सके।

‘कल्याण’ केंद्र में होना चाहिए

उन्होंने कहा कि पारिवारिक न्यायालयों का मूल दर्शन ग्रामीण विकास या वित्तीय विवादों से अलग है:
यहाँ केंद्र में परिवार का कल्याण है, इसलिए न्यायिक दृष्टिकोण संवेदनशील और सहायक होना चाहिए।

मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि न्यायालयों को

  • तेजी से सुनवाई
  • न्यूनतम टकराव
  • और बच्चों के हितों को प्राथमिकता
    जैसे मानकों पर काम करना चाहिए।

मध्यस्थता और परामर्श की भूमिका

भाषण में कहा गया कि कई मामलों में, अलगाव अंतिम उपाय नहीं होता।
प्रशिक्षित मध्यस्थ, मनोवैज्ञानिक सहायता और सामुदायिक समर्थन से

  • संवाद बहाल
  • भावनात्मक तनाव कम
  • और संयुक्त समाधान संभव हो सकते हैं।

समग्र दृष्टिकोण की आवश्यकता

अधिकारी ने कहा कि परिणाम केवल आदेश देने से नहीं, बल्कि

  • दोनों पक्षों को सुने जाने
  • सहानुभूति
  • और संबंध सुधार
    के माध्यम से बेहतर हो सकते हैं।

निष्कर्ष:
मुख्य न्यायाधीश ने पारिवारिक न्यायालयों से अपेक्षा की कि वे न केवल विवादों का समाधान करें, बल्कि परिवारिक सौहार्द को पुनर्स्थापित करने में सक्रिय भूमिका निभाएं। संवेदनशील दृष्टिकोण, मध्यस्थता और समग्र उपचार इस लक्ष्य को प्राप्त करने के महत्वपूर्ण माध्यम बताए गए।