दिल्ली व्यापार समझौता: “अब तक का सर्वश्रेष्ठ, पर बेहद कठिन”

अमेरिका ने भारत को कहा “टफ नट टू क्रैक” बड़े ट्रेड अंडरस्टैंडिंग के बावजूद

भारत और अमेरिका के बीच हाल ही में संपन्न हुआ महत्वपूर्ण व्यापार समझौता वैश्विक सुर्खियों में है। अमेरिकी ट्रेड प्रतिनिधि (USTR) ने इस डील को “अब तक का सर्वश्रेष्ठ, पर बेहद चुनौतीपूर्ण” बताते हुए कहा कि भारत एक “टफ नट टू क्रैक”, यानी कठिन साझेदार है, क्योंकि उसकी बातचीत शैली बेहद सावधानीपूर्ण और दृढ़ है।

क्या कहा अमेरिकी ट्रेड प्रतिनिधि ने

USTR के मुताबिक, समझौता व्यापक और दोनों देशों के हितों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। लेकिन उन्होंने यह भी जोड़ा कि भारत के साथ किसी भी व्यापारिक पैकेज को अंतिम रूप देना आसान नहीं होता, क्योंकि भारत अक्सर

  • घरेलू उद्योगों की सुरक्षा,

  • संवेदनशील सेक्टर्स में नियंत्रण,

  • और दीर्घकालिक आर्थिक संतुलन
    को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है।

उनका कहना था कि “भारत के साथ प्रगति हर बार संभव है, लेकिन कभी भी सीधी रेखा में नहीं होती।”

डील के मुख्य बिंदु

दोनों देशों ने समझौते में कई क्षेत्रों को शामिल किया है:

  • डिजिटल व्यापार और तकनीकी सहयोग

  • कृषि और खाद्य निर्यात

  • नवीकरणीय ऊर्जा और क्लीन टेक

  • बौद्धिक संपदा और विनियामक ढांचे में सुधार

अमेरिका का दावा है कि यह समझौता दोनों देशों के लिए “विन–विन” मॉडल प्रस्तुत करता है।

भारत की प्रतिक्रिया

भारत ने कहा कि हर समझौता भारतीय किसानों, उद्योगों और उपभोक्ताओं के हितों को ध्यान में रखकर ही किया जाता है। सरकारी सूत्रों के अनुसार, भारत ने कई क्षेत्रों में रियायत दी है, लेकिन किसी भी महत्वपूर्ण सेक्टर में अपनी रणनीतिक स्वायत्तता से समझौता नहीं किया।

भारत ने स्पष्ट किया कि मजबूत वार्ताओं का उद्देश्य “न्यायसंगत और संतुलित व्यापार” सुनिश्चित करना है।

विशेषज्ञों की राय

आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान अमेरिका की वार्ता रणनीति को दर्शाता है, जो वैश्विक मंचों पर भारत की बढ़ती आर्थिक शक्ति को स्वीकार करता है।
कुछ विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि भारत के साथ व्यापार समझौते कठिन होते हैं, लेकिन लंबे समय में लाभदायक सिद्ध होते हैं।

आगे की राह

दोनों देशों के बीच आने वाले महीनों में रक्षा, तकनीक और सप्लाई चेन विविधीकरण पर आगे की बातचीत होने की उम्मीद है। जानकार मानते हैं कि यह डील आने वाले वर्षों में भारत–अमेरिका व्यापारिक संबंधों की दिशा निर्धारित कर सकती है।