गायत्री नगर में निकली भव्य रथयात्रा: मुख्यमंत्री-सांसदों ने निभाई पारंपरिक छेरापहरा
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में ओडिशा की तर्ज पर इस वर्ष भी भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा धूमधाम से निकाली गई। शहर के गायत्री नगर स्थित श्रीजगन्नाथ मंदिर में आयोजित इस रथयात्रा में राज्यपाल रमेश बैस और मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने सोने की झाड़ू लगाकर परंपरागत ‘छेरापहरा’ की रस्म निभाई। यह रस्म रथ यात्रा प्रारंभ होने से पहले भगवान के रथ मार्ग को स्वर्ण झाड़ू से स्वच्छ करने की परंपरा है।
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने इस अवसर पर प्रदेशवासियों को रथयात्रा की शुभकामनाएं दीं और कहा कि भगवान जगन्नाथ किसानों के रक्षक हैं। उन्हीं की कृपा से वर्षा होती है, फसल लहलहाती है और समृद्धि आती है। उन्होंने कामना की कि भगवान सभी छत्तीसगढ़वासियों पर अपनी कृपा बनाए रखें और प्रदेश को शांति, समृद्धि एवं खुशहाली की ओर अग्रसर करें।


गायत्री नगर में निकाली गई भव्य रथयात्रा
गायत्री नगर के श्रीजगन्नाथ मंदिर से भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के तीन रथ निकाले गए। ये रथ दसपल्ला के जंगलों की लकड़ी से पारंपरिक रूप से निर्मित किए गए हैं।
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जगन्नाथ जी का रथ – नंदीघोष, छत्र का रंग लाल
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बलभद्र जी का रथ – तालध्वज, छत्र का रंग हरा
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सुभद्रा जी का रथ – देवदलन, छत्र का रंग पीला
रथ यात्रा गायत्री नगर मंदिर से प्रारंभ होकर अवंती विहार रोड, खम्हारडीह थाना चौक से होते हुए बीटीआई ग्राउंड तक गई।

शहर में अन्य प्रमुख रथयात्राएं
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सदरबाजार रथयात्रा – शदाणी चौक से प्रारंभ होकर कोतवाली चौक, मालवीय रोड, जयस्तंभ चौक, शारदा चौक, एमजी रोड होते हुए पुजारी बाड़ा तक जाती है। सदरबाजार में रथयात्रा की 200 साल से अधिक पुरानी परंपरा है।
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टूरी-हटरी रथयात्रा – करीब 500 साल पुराने मंदिर से निकलने वाली यह यात्रा तंग गलियों से गुजरती है, इसलिए इसमें स्टीयरिंग और ब्रेक भी लगाए गए हैं।
इन रथों को खींचने के लिए केवल नारियल की रस्सियों का प्रयोग किया जाता है, जो शुद्धता और परंपरा का प्रतीक है।

भगवान की सेवा और नेत्र उत्सव
मान्यता है कि ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन भगवान को अत्यधिक स्नान कराने के कारण वे अस्वस्थ हो जाते हैं। इस दौरान उन्हें आराम दिया जाता है और विशेष सेवा की जाती है। रायपुर के सभी प्रमुख जगन्नाथ मंदिरों में इस सेवा काल में प्रभु को काढ़े का भोग अर्पित किया जाता है। इसके बाद ‘नेत्र उत्सव’ मनाकर रथयात्रा की शुरुआत की जाती है।
5000 साल पुराना परंपरा का इतिहास
मान्यता है कि कलियुग के प्रारंभ में मालव देश के राजा इंद्रद्युम को समुद्र में तैरती लकड़ियां मिलीं, जिससे भगवान की मूर्ति बनवाई गई। देव शिल्पी विश्वकर्मा ने एकांत में मूर्ति निर्माण की शर्त रखी, लेकिन कार्य अधूरा रह गया। तभी आकाशवाणी हुई कि भगवान जगन्नाथ अधूरे रूप में ही प्रतिष्ठित होना चाहते हैं। तब से यह परंपरा स्थापित हुई।
इंद्रद्युम ने भगवान को हर वर्ष जन्मभूमि ले जाने की परंपरा शुरू की, जो आज रथयात्रा के रूप में मनाई जाती है। स्कंदपुराण के अनुसार यह यात्रा आषाढ़ शुक्ल द्वितीया से प्रारंभ होती है।
