कोंडागांव में 309 पारंपरिक वैद्यों का प्रमाणन, औषधि पादप बोर्ड ने प्रदान की आधिकारिक पहचान

वन मंत्री केदार कश्यप ने कहा—पारंपरिक वैद्य प्रकृति से जुड़ाव बनाए रखने और ग्रामीण अंचलों में स्वास्थ्य परंपराओं को जीवित रखने में निभा रहे अहम भूमिका

कोंडागांव, 24 अक्टूबर 2026।

कोंडागांव ऑडिटोरियम में आज छत्तीसगढ़ आदिवासी, स्थानीय स्वास्थ्य परंपरा एवं औषधि पादप बोर्ड द्वारा पारंपरिक वैद्यों के प्रमाणन कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में छह जिलों के 309 पारंपरिक वैद्यों को प्रमाणपत्र प्रदान किए गए। इनमें कोंडागांव, नारायणपुर, कांकेर, धमतरी, गरियाबंद और महासमुंद जिले के वैद्य शामिल हैं। कार्यक्रम में वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री केदार कश्यप मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। औषधि पादप बोर्ड के अध्यक्ष विकास मरकाम ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की, जबकि कोंडागांव विधायक लता उसेंडी और औषधि पादप बोर्ड के उपाध्यक्ष अंजय शुक्ला विशेष अतिथि के रूप में शामिल हुए। इस अवसर पर बड़ी संख्या में अधिकारी-कर्मचारी एवं अन्य लोग उपस्थित रहे।

वन मंत्री केदार कश्यप ने कहा कि पारंपरिक वैद्य प्रकृति के साथ जुड़ाव बनाए रखने और ग्रामीण अंचलों में स्थानीय स्वास्थ्य परंपराओं को जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। उनके पास पीढ़ियों से संचित औषधीय पौधों और पारंपरिक उपचार पद्धतियों का अनुभव एवं ज्ञान है। यह ज्ञान हमारी सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। पारंपरिक वैद्यों का प्रमाणन उनके अनुभव और सेवाओं को पहचान देने तथा पारंपरिक चिकित्सा विरासत के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इससे स्थानीय स्वास्थ्य परंपराओं को प्रोत्साहन मिलेगा और इनसे जुड़े वैद्यों को समाज में उचित सम्मान प्राप्त होगा।

औषधि पादप बोर्ड के अध्यक्ष विकास मरकाम ने केंद्र और राज्य सरकार के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि पारंपरिक वैद्यों को प्रमाणित कर आधिकारिक पहचान दिलाने से उनके ज्ञान और अनुभव को सम्मान मिलेगा। उन्होंने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु के छत्तीसगढ़ प्रवास के दौरान उनसे हुई मुलाकात और प्राप्त मार्गदर्शन को ऐतिहासिक एवं प्रेरणादायी बताया। उन्होंने कहा कि पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों के संरक्षण और वैद्य समाज के सशक्तीकरण के लिए किए जा रहे प्रयास महत्वपूर्ण हैं। प्रमाणन से वैद्यों को अपनी पारंपरिक ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ाने के साथ सामाजिक पहचान मजबूत करने का अवसर मिलेगा। उन्होंने विश्वास जताया कि इस पहल से वैद्य समाज के जीवन में सकारात्मक बदलाव आएगा और पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने में मदद मिलेगी।

कोंडागांव विधायक लता उसेंडी ने पारंपरिक वैद्यकीय परंपरा को व्यवस्थित एवं व्यावसायिक स्वरूप देने की दिशा में औषधि पादप बोर्ड की पहल की सराहना की। उन्होंने कहा कि पारंपरिक वैद्य लंबे समय से अपने अनुभव और स्थानीय औषधीय पौधों के ज्ञान के माध्यम से लोगों की सेवा करते आ रहे हैं। उनके ज्ञान को पहचान देना और इसे संरक्षित करना आवश्यक है। प्रमाणन से वैद्यों के पारंपरिक ज्ञान और वर्षों के अनुभव को आधिकारिक पहचान मिलेगी। इससे उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा को मजबूती मिलेगी तथा आजीविका के अवसरों को बढ़ावा देने में भी मदद मिल सकती है। उन्होंने कहा कि पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ाने से इस विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का मार्ग प्रशस्त होगा।

औषधि पादप बोर्ड के उपाध्यक्ष अंजय शुक्ला ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के मार्गदर्शन में भारतीय पारंपरिक चिकित्सा पद्धति के संरक्षण, संवर्धन और विस्तार के लिए निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि पारंपरिक वैद्यों का प्रमाणन उन्हें आधिकारिक पहचान और सम्मान दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है। इससे वैद्यों के पारंपरिक ज्ञान और वर्षों के अनुभव को मान्यता मिलेगी तथा उनके सामाजिक सशक्तीकरण को बढ़ावा मिलेगा। उन्होंने विश्वास जताया कि केंद्र और राज्य सरकार के प्रयासों से पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को नई पहचान मिलेगी और वैद्य समाज अपनी समृद्ध ज्ञान परंपरा को संरक्षित रखते हुए निरंतर जनसेवा में योगदान देता रहेगा।

बोर्ड का लक्ष्य मार्च 2027 तक प्रदेश के सभी 33 जिलों में कुल 1,000 पारंपरिक वैद्यों का प्रमाणन करना है। इस पहल का उद्देश्य पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान का दस्तावेजीकरण, वैद्यों को आधिकारिक पहचान दिलाना और उनका सशक्तीकरण करना है। इसके माध्यम से छत्तीसगढ़ की समृद्ध स्थानीय स्वास्थ्य परंपराओं को संरक्षित करने तथा पारंपरिक चिकित्सा से जुड़े लोगों को प्रोत्साहित करने की दिशा में काम किया जा रहा है।

बोर्ड के मुख्य कार्यपालन अधिकारी जे.ए.सी.एस. राव ने कहा कि पारंपरिक वैद्यों का प्रमाणन प्रदेश की सांस्कृतिक और चिकित्सा विरासत को संरक्षित करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है। इससे पारंपरिक ज्ञान को संस्थागत पहचान मिलेगी और इस क्षेत्र से जुड़े लोगों को आगे बढ़ने के अवसर प्राप्त होंगे।