गजनवी से नेहरू तक: सोमनाथ मंदिर का विध्वंस, लूट और पुनर्निर्माण पर विवाद की पूरी कहानी

सोमनाथ मंदिर भारतीय इतिहास का वह अध्याय है, जहां आस्था, आक्रमण और राजनीति एक-दूसरे से टकराते दिखाई देते हैं। गुजरात के प्रभास पाटन में स्थित यह प्राचीन शिव मंदिर न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा है, बल्कि ऐतिहासिक विवादों का केंद्र भी बना।

🏹 गजनवी का आक्रमण और लूट का दावा

इतिहासकारों के अनुसार 11वीं शताब्दी में महमूद गजनवी ने सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण किया। उस समय यह मंदिर अपार संपत्ति और सोने-चांदी के भंडार के लिए प्रसिद्ध था।
लोककथाओं और कुछ ऐतिहासिक वर्णनों में यह दावा मिलता है कि गजनवी ने मंदिर को तोड़कर वहां से भारी मात्रा में संपत्ति लूटी और शिवलिंग को खंडित किया। हालांकि, 6 टन सोना लूटे जाने और शिवलिंग के टुकड़े किसी मस्जिद में लगाए जाने जैसे दावे पर इतिहासकारों में आज भी मतभेद हैं। प्रामाणिक दस्तावेज़ों में इन तथ्यों की पुष्टि सीमित रूप में ही मिलती है।

🛕 बार-बार टूटा, फिर भी बना सोमनाथ

सोमनाथ मंदिर को इतिहास में कई बार नष्ट किया गया, लेकिन हर बार स्थानीय शासकों और भक्तों ने इसका पुनर्निर्माण किया। यही कारण है कि यह मंदिर “अटूट आस्था” का प्रतीक माना जाता है।

🏛️ आज़ादी के बाद नया विवाद

भारत की स्वतंत्रता के बाद जब सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण की योजना बनी, तो तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इसे सरकारी परियोजना के रूप में प्रस्तुत करने का विरोध किया।
नेहरू का तर्क था कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है और राज्य को धार्मिक निर्माण से दूरी बनाए रखनी चाहिए। हालांकि, उन्होंने निजी या सार्वजनिक दान से मंदिर निर्माण पर रोक नहीं लगाई।

इसके विपरीत, देश के पहले उप-राष्ट्रपति सरदार वल्लभभाई पटेल मंदिर पुनर्निर्माण के पक्षधर थे। अंततः मंदिर का निर्माण जनसहयोग और ट्रस्ट मॉडल के तहत पूरा हुआ।

⚖️ इतिहास, आस्था और राजनीति

आज भी यह सवाल चर्चा में रहता है कि

  • क्या गजनवी से जुड़े सभी दावे ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित हैं?

  • क्या नेहरू का विरोध धर्मनिरपेक्षता की रक्षा था या आस्था से दूरी?

विशेषज्ञ मानते हैं कि सोमनाथ मंदिर का इतिहास केवल एक धार्मिक स्थल की कहानी नहीं, बल्कि भारत की सभ्यतागत स्मृति, राजनीतिक दृष्टिकोण और ऐतिहासिक व्याख्याओं का संगम है।

सोमनाथ मंदिर सदियों से आक्रमण, विनाश और पुनर्निर्माण का साक्षी रहा है। गजनवी का आक्रमण हो या नेहरू काल का वैचारिक विवाद—हर दौर में यह मंदिर बहस के केंद्र में रहा, लेकिन आस्था कभी टूटी नहीं।

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