1978 में छत्तीसगढ़ राज्य बनने से चूका था फैसला, पीएम मोरारजी देसाई तैयार थे पर एमपी के सीएम के विरोध से अटका प्रस्ताव

छत्तीसगढ़ के राज्य गठन को लेकर इतिहास के पन्नों में एक कम ज्ञात लेकिन बेहद महत्वपूर्ण प्रसंग दर्ज है। वर्ष 1978 में देश की राजनीति ऐसे मोड़ पर थी, जब छत्तीसगढ़ को अलग राज्य का दर्जा मिलने की उम्मीद अपने सबसे करीब पहुंच गई थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने के लिए सहमत थे, और केंद्र स्तर पर इस विषय को सकारात्मक रूप से देखा जा रहा था।

हालांकि, अंतिम क्षणों में यह फैसला ठहर गया। मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरेंद्र प्रताप सिंह ने इस कदम का कड़ा विरोध दर्ज कराया। उनका तर्क था कि प्रदेश के विभाजन से प्रशासनिक ढांचा कमजोर पड़ेगा और आर्थिक असंतुलन बढ़ेगा। मुख्यमंत्री के इस विरोध के बाद प्रस्ताव को आगे बढ़ाने पर रोक लगा दी गई, जिसके चलते छत्तीसगढ़ का राज्य गठन लगभग दो दशक तक और टल गया।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि 1978 में यह निर्णय पारित हो जाता, तो छत्तीसगढ़ का विकास ढांचा और राजनीतिक परिदृश्य आज पूरी तरह अलग दिखाई देता। बाद में 2000 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के कार्यकाल में छत्तीसगढ़ को स्वतंत्र राज्य का दर्जा मिला, जिसने क्षेत्र की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक दिशा को नया आयाम दिया।

यह प्रसंग आज भी इस बात की याद दिलाता है कि किस प्रकार राजनीति के अंतिम क्षणों में हुए निर्णय इतिहास की दिशा तय कर देते हैं।